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Monday, 13 January 2014

टिहरी रियासत के खिलाफ संघर्ष के महानायक

Indresh Maikhuri
इन्द्रेश मैखुरी
-इन्द्रेश मैखुरी

"...किसानों पर होने वाले जुल्म के विरुद्ध दादा दौलतराम और नागेन्द्र सकलानी के नेतृत्व में किसानों के संघर्षों को संगठित किया गया.नागेन्द्र सकलानी युवा थे.देहरादून में हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आये थे.टिहरी लौटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से वे राजशाही के विरुद्ध चलने वाले आन्दोलनों में ना केवल शरीक हुए बल्कि उन्हें संगठित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.डांगचौरा के किसान आन्दोलन में काफी समय तक पुलिस को छकाते रहने के बाद उनकी गिरफ्तारी हो सकी थी.उसके बाद लम्बे अरसे तक राजा की आतातायी कैद में उन्हें रहना पडा..."

नागेन्द्र सकलानी
देश की आजादी के पांच महीने बाद,जनता के शासन की मांग करना और इस मांग के लिए शहादत होना,सुनने में कुछ अजीब सा लगता है. लेकिन उत्तराखंड की तत्कालीन टिहरी रियासत में 11 जनवरी 1948 को दो नौजवानों-नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शाहदत,रियासत में राजशाही से मुक्ति और जनता का शासन स्थापित करने के लिए हुई.देश में आजादी की लड़ाई दो मोर्चों पर लड़ी जा रही थी. एक तरफ अंग्रेजी राज से मुक्ति पाने की लड़ाई थी और दूसरी तरफ राजे-रजवाड़ों की रियासतों में इनके जुल्मी राज से निजात पाने का संघर्ष था.अंग्रेजों से मुक्ति तो 15 अगस्त 1947 को मिल गयी पर टिहरी रियासत के भीतर अंग्रेजों के चले जाने के जश्न से ज्यादा राजा के दमन से मुक्ति पाने की तीव्र खदबदाहट थी.


30 मई1930 में वर्तमान उत्तरकाशी जिले के रंवायीं क्षेत्र में तिलाड़ी में अन्यायी वन कानूनों के खिलाफ सभा करता हुए लोगों का कत्लेआम हुआ. तिलाड़ी के मैदान को तीन तरफ से शाही फ़ौज ने घेरा,जो हिस्सा फ़ौज ने नहीं घेरा था,वहाँ यमुना नदी बह रही था.मैदान में इकठ्ठा हुए लोगों के पास दो ही विकल्प बचे या तो राजा की फ़ौज की गोलियों से मरें या फिर यमुना में कूद कर.इस तरह टिहरी रियासत ने तिलाड़ी में अपना लोकल जलियांवाला बाग़ कांड रच कर,जुल्म करने के मामले में अपने औपनिवेशिक प्रभुओं की बराबरी करने की कोशिश की.25 जुलाई 1944 को 84 दिन के अनशन के बाद श्रीदेव सुमन की शहादत हुई,जो कि राजा के अधीन उत्तरदायी शासन की ही मांग कर रहे थे.

इन बलिदानों के बीच टिहरी रियासत के अन्दर जनता पर राजशाही का दमन जारी रहा.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो दूर की कौड़ी थी.शांतिपूर्ण सभा,जुलुस प्रदर्शन आदि का अधिकार राजदरबार में बंधक था.नाममात्र की खेती पर भी राजा की तरफ से भारी कर थोप दिए गए थे.दलदली और ढलवां भूमि जिस पर बमुश्किल ही खेती हो पाती थी,उस पर भी 75 से 80 रुपया कर लिया जाता था.जिन क्षेत्रों में आलू उत्पादन अच्छा होता था,वहां इसे बेचने का अधिकार राजा ने आलू सिंडिकेट को दे दिया था.आलू सिंडिकेट वाले किसानों से बेहद मामूली दामों पर आलू खरीदते और उन्हें बाहरी प्रदेशों में ऊँचे दामों पर बेच कर भारी मुनाफा कमाते थे.

किसानों पर होने वाले जुल्म के विरुद्ध दादा दौलतराम और नागेन्द्र सकलानी के नेतृत्व में किसानों के संघर्षों को संगठित किया गया.नागेन्द्र सकलानी युवा थे.देहरादून में हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आये थे.टिहरी लौटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से वे राजशाही के विरुद्ध चलने वाले आन्दोलनों में ना केवल शरीक हुए बल्कि उन्हें संगठित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.डांगचौरा के किसान आन्दोलन में काफी समय तक पुलिस को छकाते रहने के बाद उनकी गिरफ्तारी हो सकी थी.उसके बाद लम्बे अरसे तक राजा की आतातायी कैद में उन्हें रहना पडा.

राजा के जेल में कैसी नारकीय स्थितयां थी इसका अंदाजा नागेन्द्र सकलानी के कर्मभूमि साप्ताहिक में छपे पत्रों,जिन्हें प्रसिद्द इतिहासकार डा.शिव प्रसाद डबराल “चारण” ने अपनी पुस्तक-उत्तराखंड का इतिहास-भाग 6*टिहरी-गढ़वाल राज्य का इतिहास (1815-1949) में उद्धृत किया है, से पता चलता है.उक्त पत्रों के अनुसार जेल में ऐसे फटे-पुराने कम्बल दिए जाते थे,जिन पर गंदगी के चलते मक्खियाँ भिनभिना रही होती थी.इसी तरह के कपडे पहनने को भी दिए जाते थे.भीषण ठण्ड में कपड़ों के अभाव में बंदी सो भी नहीं पाते थे.नागेन्द्र सकलानी अपने एक पत्र में लिखते हैं कि “ऐसा प्रयत्न किया जाता था कि राजनीतिक बंदी दरबार के सम्मुख घुटने टेक दे.” शाह वंशीय टिहरी के राजाओं की न्याय व्यवस्था कितनी अन्यायकारी थी,इसका अंदाजा जेल में रहते हुए नागेन्द्र सकलानी और दादा दौलत राम द्वारा 10 फरवरी 1947 को किये गए अनशन की मांगों से लगाया जा सकता है.

किसान आन्दोलन के दौरान छीनी गयी संपत्ति की वापसी और अन्य मांगों के साथ उनकी एक मांग यह भी थी कि या तो उनपर लगाए गए आरोप वापस हों या फिर उनपर लगे अभियोगों की सुनवाई ब्रिटिश अदालत में हो.जिन अंग्रेजों के न्याय के पाखण्ड को भगत सिंह और उनके साथी पहले ही बेपर्दा कर चुके थे,टिहरी रियासत के राजनीतिक बंदी यदि उन अंग्रेजों की अदालत में इन्साफ पाने की कुछ उम्मीद देख पा रहे थी तो इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि टिहरी रियासत की अदालतों में राजा की स्वेछाचारिता के अलावा न्याय की कोई अन्य कोटि रही ही नहीं होगी.

बहरहाल नागेन्द्र सकलानी और दादा दौलत राम के उक्त अनशन का समाचार फ़ैलने पर बड़ी राजनीतिक हलचल हुई.देशी राज्य लोकपरिषद,कांग्रेस,कम्युनिस्ट पार्टी,टिहरी राज्य प्रजामंडल और प्रवासी गढ़वालियों की संस्थाओं ने तत्काल राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग की.मजबूरन राजा को घोषणा करनी पड़ी कि 21 फरवरी 1947 को राजनीतिक बंदियों को मुक्त कर दिया जाएगा.

20 फरवरी 1947 को  ब्रिटेन की संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1948 से पहले भारत से अंग्रेजी राज के रुखसत होने का ऐलान कर दिया था.जिस समय जवाहरलाल नेहरू के आह्वान पर देसी राज्यों की कई रियासतों के प्रतिनिधि संविधान सभा में हिस्सा लेने आ रहे थे,लगभग उसी वक्त टिहरी के राजा ने “टिहरी गढ़वाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट” पर दस्तखत कर दिए.इसके तहत राजदरबार के किसी भी कर्मचारी को राज्य की व्यवस्था भंग करने वाले को गिरफ्तार करने का अधिकार दे दिया गया था.स्पष्ट तौर पर यह राजशाही के विरुद्ध उठने वाले प्रतिरोध को कुचलने के लिए किया गया था.जहां राजा देश में चल रही बदलाव की लहर को अनदेखा करते हुए अपना दमनकारी शासन कायम रखना चाहता था,वहीँ प्रजा हर हाल में राजशाही की गुलामी से मुक्ति पाना चाहती  थी.

जनता की इस मुक्ति की चाह और नागेन्द्र सकलानी जैसे नेत्रित्वकारियों के साहस का परिणाम था कि टिहरी रियासत के भीतर सकलाना से शुरू होकर जगह-जगह आजाद पंचायतें कायम होने लगी.इन आजाद पंचायतों ने राज कर्मचारियों को खदेड़ दिया,पटवारी चौकियों पर कब्जा कर लिया,शराब की भट्टियां तोड़ डाली और राजधानी टिहरी पर कब्जा करने के लिए सत्याग्रही भर्ती करने का ऐलान किया.कीर्तिनगर में ऐसी ही आजाद पंचायत के गठन के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से नागेन्द्र सकलानी और त्रेपनसिंह पहुंचे थे.

10 जनवरी 1948 को नागेन्द्र सकलानी की अगुवाई में कीर्तिनगर में सभा हुई और वहां राजा के न्यायालय पर कब्जा कर,उसपर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर आजाद पंचायत की स्थापना की घोषणा कर दी गयी.11 जनवरी को राजा के सब डिविजनल ऑफिसर(एस.डी.ओ.) और पुलिस सुपरिंटेंडेंट के नेतृत्व में पुलिस ने  न्यायालय पर कब्जा करना चाहा.लोगों ने उन्हें बंधक बनाने की कोशिश की.एस.डी.ओ. के आदेश पर आंसू गैस के गोले लोगों पर छोड़े गए.क्रुद्ध जनता ने राजा के न्यायालय भवन पर आग लगा दी.आग लगी देख एस.डी.ओ. और पुलिस सुपरिंटेंडेंट जंगल की तरफ भागने लगे.नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी उन्हें पकड़ने दौड़े तो एस.डी.ओ. ने उनपर गोली चला दी,जिससे दोनों शहीद हो गए.

पेशावर विद्रोह के नायक कामरेड चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में दोनों शहीदों का जनाजा टिहरी ले जाया गया और राजाओं के शमशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया.अपने पुत्र मानवेन्द्र शाह को गद्दी सौंप कर भी राज्य पर नियंत्रण रखने वाले राजा नरेन्द्र शाह को टिहरी के अन्दर नहीं घुसने दिया गया.टिहरी में प्रजामंडल के नेतृत्व में अंतरिम सरकार गठित हुई और 1949 में टिहरी का भारत में विलय हो गया. कामरेड नागेन्द्र सकलानी और कामरेड मोलू भरदारी(ये कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीद्वार सदस्य थे) की शहादत टिहरी राजशाही के ताबूत में अंतिम कील साबित हुई.

यह विडम्बना ही कही जायेगी कि जिस राजशाही से मुक्ति पाने के लिए इतनी शहादतें और कुर्बानियां हुई,पहले लोकसभा चुनाव में उसी राजपरिवार की राजमाता कमलेन्दुमती शाह टिहरी संसदीय सीट से लोकसभा में जनता की प्रतिनिधि हो गयी.फिर दूसरी लोकसभा से चौथी लोकसभा तक और दसवीं लोकसभा से चौदहवीं लोकसभा में अपने जीवन के अंतिम समय तक मानवेन्द्र शाह,जिनका राजपाट बचाने के लिए नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की ह्त्या हुई,वे “जनता का प्रतिनिधित्व” करते रहे. पंद्रहवीं लोकसभा में टिहरी सीट के लिए हुए उपचुनाव में उनकी बहु मालाराज्लाक्ष्मी शाह सांसद हो गयीं. 

मानवेन्द्र शाह की राजनीतिक यात्रा तो आजादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस और आज राष्ट्रभक्ति की सबसे बड़ी झंडाबरदार भाजपा के अवसरवाद को भी साफ़ करती है. दूसरी से चौथी लोकसभा यानि 1957 से 1970 तक मानवेन्द्र शाह कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे और दसवीं लोकसभा यानि 1991 से चौदहवीं लोकसभा में अपने जीवन के अंतिम दिनों तक भाजपा के टिकट पर लोकसभा पहुँचते रहे. एक तरफ देश के लिए कुर्बान होने वालों की हिमायत और दूसरी तरफ जलियांवाला बाग़ काण्ड की छोटी-बड़ी प्रतिकृति रचने वालों को जनता का प्रतिनिधि बनवा देने,दोनों विपरीत ध्रुवी कामों को इन्होने बखूबी साधा हुआ है. यह हमारे लोकतंत्र का विद्रूप ही कहा जाएगा कि रियासतों-रजवाड़ों के राजा-महाराजा, आजादी के बाद लोकतंत्र के राजा हो गए.

नागेन्द्र सकलानी ने राजा के मातहत उत्तरदायी शासन और सभा,जुलूस,प्रदर्शन आदि करने की मांगों तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा बल्कि उस समय राजशाही द्वारा लगाए तमाम तरह के कर और अकाल की मार से कराह रही आम जनता तथा किसानों के साथ ना केवल उन्होंने स्वयं को एकताबद्ध किया बल्कि आगे बढ़कर उनका नेतृत्व किया.राजशाही को उखाड़ फैंकने और आजाद पंचायतों की स्थापना के अगुवा नेता तो वे थे ही. कामरेड नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादात ना केवल टिहरी रियासत के विरुद्ध निर्णायक शहादत थी,बल्कि यह जनता की मुक्ति के संघर्ष और भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन की बलिदानी,क्रांतिकारी परम्परा का भी एक स्वर्णिम अध्याय है.
                                         इन्द्रेश 'आइसा' के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं 
और अब भाकपा-माले के नेता हैं. 
indresh.aisa@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.

Wednesday, 23 October 2013

मर्तोलिया रिहा, कहा सरकार में आपदा प्रभावितों के सवालों का जवाब देने का नहीं है साहस

-प्रैक्सिस प्रतिनिधि
डीडीहाट (उत्तराखंड)
प्रेस को संबोधित करते जगत मर्तोलिया और जोध सिह बोरा 

"...डीडीहाट में हुयी पत्रकार वार्ता में मर्तोलिया ने जेल से रिहा होने के बाद कहा कि मुख्यमंत्री की धारचूला की यात्रा पंचायत व लोकसभा चुनाव के लिए थी जो फ्लाप हो चुकी है। धारचूला की जनता दोनों चुनावों मे सरकार को इसका सबक सिखायेगी। पुर्नवास, मुआवजा वितरण, नदी किनारे स्थित गांवो के सुरक्षा सहित जिन 15 सवालों को हमने उठाया था उस पर मुख्सयमंत्री ने कोई ध्यान नही दिया।..."

भाकपा माले के जिला सचिव जगत मर्तोलिया को आज रिहा कर दिया गया. मर्तोलिया ने कहा कि मुख्यमंत्री के भीतर आपदा प्रभावितो के सवालो का जबाब देने पर नैतिक साहस नही था इसलिये उन्हें जेल भेजकर आन्दोलनकारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया गया है।
डीडीहाट में हुयी पत्रकार वार्ता में मर्तोलिया ने जेल से रिहा होने के बाद कहा कि मुख्यमंत्री की धारचूला की यात्रा पंचायत व लोकसभा चुनाव के लिए थी जो फ्लाप हो चुकी है। धारचूला की जनता दोनों चुनावों मे सरकार को इसका सबक सिखायेगी। पुर्नवास, मुआवजा वितरण, नदी किनारे स्थित गांवो के सुरक्षा सहित जिन 15 सवालों को हमने उठाया था उस पर मुख्सयमंत्री ने कोई ध्यान नही दिया। यह वक्त जनजाति आयोग बनाने का नही था। आपदा प्रभावित परिवारो के लिये घर व गांव बनाने का था लेकिन मुख्यमंत्री ने आपदा प्रभावितों को पूर्ण रूप से निराश किया है। अब प्रभावित अपने संघर्षो के बल पर पुर्नवास को हासिल करेंगे। 
उन्होंने कहा कि पांचवां माह शुरू होने के बाद भी मकान, जमीन, फसल, मवेशी का मुआवजा तक नही मिला है। राहत आयुक्त दीपक रावत चहेरा दिखाकर धारचूला से चले गए, उन्होंने मुआवजे के एक भी चैक पर हस्ताक्षर नहीं किया। इसे उन्होंने क्षेत्रीय काग्रेसी विधायक का निक्कमापन बताया। उन्होने कहा कि जनता की आवाज को दबाने के लिये काग्रेस सरकार और विधायक के इशारे पर धारचूला मे सवैधानिक अधिकारों की हत्या हो रही है। इसके खिलाफ वे प्रत्येक गांवो के जाकर जन-जन तक इस बात को पहुंचा काग्रेस का सफाया करेगें। 
उन्होने मुख्यमंत्री से 15 सवालो को पूछने के मामले में प्रशासन और पुलिस द्वारा काग्रेस विधायक के इशारे पर की गयी कार्यवाही को न्याय के सिद्धांत के खिलाफ बताया और कहा कि इसके खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और उच्च न्यायालय मे शिकायत की जायेगी। इस मौके पर राज्य आन्दोनकारी जोध सिह बोरा ने कहा कि जगत मार्तेलिया पर जो पुलिसिया कार्यवाही की गयी वह सरकार के इशारे पर की गयी है। और आपदा के लिये आन्दोलन करने वालो को दबाने व डराने का काम सरकार कर रही है जिसे बर्दाश्त नही किया जायेगा।

जगत मर्तोलिया और साथियों की गिरफ्तारी क्यों?

तो कामरेड जगत मर्तोलिया अपने १० साथियों के साथ 
गिरफ्तार हो गए. ये वही जगत मर्तोलिया हैं जो लगातार उत्तराखंड के उन आपदा प्रभावित इलाकों की हकीकत हमें अपने आलेखों के मध्यम से बता रहे थे, जहाँ न कोई मीडिया पहुँच पाया था न ही सरकारी/गैरसरकारी राहत कर्मी. इस बीच एक आरटीआई के जरिये पता चला था कि उत्तराखंड सरकार ने आपदा के बाद राहत बाँटने के बजाय तकरीबन समूचे मीडिया को अपने विज्ञापनों की बाढ़ से डिगा डाला था. ऐसे में कुछ एक ही मीडियाकर्मी और राजनीतिक कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर कार्य कर लगातार सरकारी राहत कार्य की पोल खोल रहे थे. जगत मर्तोलिया भी धारचूला के प्रभावित इलाकों में चल रही अनियमितताओं/अनदेखी पर लगातार लोगों को गोलबंद कर धरने दे रहे थे साथ ही इस पर लगातार आलेख भी लिख रहे थे. जिन्हें हमने praxis में लगातार प्रकाशित किया. (इन आलेखों को यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है). २१ अक्टूबर को मुख्यमंत्री की धारचूला यात्रा में भी उनकी आपदा प्रभावितों के साथ मुख्यमंत्री से मिलने की उनकी योजना थी. लेकिन पुलिस ने उन्हें पहले ही गिरफ्तार कर लिया. हम praxis की ओर से अपने इस सहयोगी की गिरफ्तारी के लिए उत्तराखंड सरकार की भर्त्सना करते हैं और उनकी तत्काल रिहाई की मांग करते हैं...
यहाँ भाकपा माले के गढ़वाल सचिव इन्द्रेश मैखुरी ने इस संबंध में एक पत्र उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को भेजा है. उसकी प्रति यहाँ प्रकाशित की जा रही है....
-सं. 

श्रीमान मुख्यमंत्री महोदय,  
उत्तराखंड शासन,  
देहरादून. महोदय, 
      कल दिनांक 21 अक्टूबर 2013 को आपके द्वारा आपदा प्रभावित क्षेत्र धारचुला का दौरा किया गया.लेकिन यह बेहद अफसोसजनक है कि आपदा प्रभावितों की मांगों को लेकर आपके समक्ष अपनी बात रखना चाह रहे भाकपा(माले) के पिथौरागढ़ जिला सचिव कामरेड जगत मर्तोलिया को प्रशासन द्वारा आपके धारचुला पहुँचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया और आपके वहाँ से लौट आने के बावजूद भी उनकी रिहाई नहीं हुई है.
महोदय,लोकतंत्र में अपनी बात कहने का हक़ सबको है. कामरेड जगत मर्तोलिया तो वो व्यक्ति हैं जो धारचुला के आपदा प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री लेकर तब पहुंचे जबकि शासन-प्रशासन तक, आपदा से तबाह हुए लोगों के सुध नहीं ले सका था. आपदा के बाद से पिथौरागढ़ में आपदा पीड़ितों के लिए राहत सामग्री जुटाने से लेकर उनकी दिक्कतों को प्रशासन के सामने लाने तक के लिए वे रात-दिन एक किये हुए थे. ऐसे व्यक्ति को क्या महज इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए कि वह एक भिन्न राजनीतिक विचारधारा से सम्बन्ध रखता है? महोदय,यदि पिथौरागढ़ के जिला प्रशासन के इस तर्क को मान भी लिया जाए कि कामरेड जगत मर्तोलिया के नेतृत्व में लोग आपके समक्ष आक्रोश प्रकट कर सकते थे, इसलिए उन्हें गिरफ्तार किया गया, तब भी यह तो आप स्वीकार करेंगे कि जो अभागे लोग प्राकृतिक आपदा में अपना सब कुछ गँवा चुके हैं, उनसे फूल-मालाओं और स्वागत में प्रशस्ति गान की अपेक्षा तो आपको भी नहीं रही होगी! महोदय,यदि आपका दौरा आपदा प्रभावित क्षेत्रों की जमीनी हकीकत जानने के लिए था तो क्या आपदा पीड़ितों का आक्रोश उस हकीकत का प्रकटीकरण नहीं होता? और राज्य का मुखिया होने के नाते क्या ऐसे किसी भी आक्रोश का शमन करने की आपसे अपेक्षा करना क्या गैर कानूनी या विधि विरोधी या आपके सम्मान को ठेस पहुंचाने जैसा आपराधिक कृत्य माना जाएगा?
महोदय,एक तरफ आपकी सरकार विभिन्न संचार माध्यमों के जरिये आपदा पीड़ितों के लिए विभिन्न उपाय करने का दावा कर रही है और दूसरी तरफ आपदा पीड़ितों के सवाल उठाने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आपकी पुलिस और प्रशासन सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर ले रहा है कि कहीं वे आपके समक्ष जमीनी हकीकत ना बयान कर दें.महोदय,तब प्रश्न यह खडा होता है कि ऐसे में असली तस्वीर क्या है-विज्ञापनों के जरिये की जा रही सरकारी घोषणाओं या फिर कामरेड जगत मर्तोलिया जैसे संघर्षशील और आपदा प्रभावितों के सवालों को मुखर हो कर उठाने वालों की गिरफ्तारी?
महोदय,धारचुला दौरे से पूर्व 21 अक्टूबर 2013 के समाचार पत्रों में ही आपका महिलाओं,मजदूरों और गरीबों पर दर्ज किये मुक़दमे वापस लेने का वक्तव्य प्रकाशित हुआ है और दूसरी तरफ आपदा पीड़ितों की बात आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे कामरेड जगत मर्तोलिया को आपका उक्त वक्तव्य प्रकाशित होने के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया,यह कैसा विरोधाभास है?
महोदय,उक्त तमाम बातों के आलोक में आपसे यह मांग है कि कामरेड जगत मर्तोलिया को अविलम्ब रिहा किया जाए,उन्हें आपदा पीड़ितों की समस्याएं आपके समक्ष रखने से रोक कर उनके संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार का हनन करने वाले पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही की जाए.साथ ही यह भी सुनश्चित करवाने की कृपा करें कि भविष्य में किसी को भी मात्र इसलिए अपनी बात कहने से ना रोक जाए कि वह राजनीतिक रूप से भिन्न मत रखता है.                      

सधन्यवाद,
सहयोगाकांक्षी,

इन्द्रेश मैखुरी,
गढ़वाल सचिव,
भाकपा(माले)

Friday, 13 September 2013

आपदा राहत के लिए अपील

आपदा के तहत कई गाँव व् कई परिवार अपनी नैसर्गिक अस्तित्व को खो चुके हैं, कई लोग बेघर होकर अपने करीबियों के लौटने की कल्पना में कहीं न कहीं आश्रय लिया हुए हैं, कुछ संस्था व सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा आंकलन किये जाने पर एक वृहद व दर्द भरा दृश्य दिखने को मिला, अन्वाडी गाँव के २२ बच्चे के लापता के साथ साथ जाल तल्ला व जाल मल्ला के करीब ७० बच्चे अभी तक घर नहीं पहुंचे हैं, माना यह जा रहा है की यह बच्चे नदी की प्रवाह में बह गए हों, जहाँ चंद्रापुरी मार्किट का नामो निशाँ ही नहीं वहीँ चंद्रापुरी गाँव का अस्तित्व ही मिट गया, भले ही जान की कोई हानि नहीं हुई लेकिन सारा गाँव नदी की आघोष में चला गया है, सर में छत नहीं, आने वाले समय में बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था, अपनी आजीविका की खोज, इत्यादि सभी सवाल उनके सामने खड़े हैं लेकिन हादसे से खौफजदा यह लोग अपनी मनोदशा के आगे विवश है, आंकलन के दौरान एक गाँव के २२ पुरुष के गायब हो जाने से पूरे गाँव की महिलाएं अपने को विधवा मान चुकी हैं, अपनी आजीविका को लेकर इस गाँव के पुरुष कार्य के लिए केदारनाथ, रामबाड़ा या अन्य जगह जाया करते थे लेकिन इस बार का जाना वापसी का मार्ग न दिखा सका, यही नहीं कई बच्चे अनाथ व कई युवा जिनकी आने वाले समय में शादी तय थी अपने माँ – पिता के खोए के बाद अपने जीवन को कैसे संवार सके, उसपे बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो चूका है।
उखीमठ व गुप्तकाशी घाटी की तरफ मचे इस विनाशकारी तांडव को देख एक सशक्त प्रयास की जरुरत है जहाँ सारे संघठन मिलके आपदा राहत के लिए दीर्धकालीन योजना पर कार्य करें, सबसे अपील की जाती है की दीर्धकालीन राहत हेतु गाँव को पुनर्जीवित व ग्रामीणों की आजीविका को खड़े करने हेतु अपने योगदान सुनिश्चित करें, ६ माह के इस कार्यक्रम में विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है: तत्कालीन और दीर्धकालीन राहत।
तत्कालीन राहत :

1. चूँकि बरसात के फिर से शुरु हने से घाटियों में बाड़ का खतरा फिर मंडराने लगा है और जान माल का नुकसान होने का भी खतरा है अत: बेघर हुए ग्रामीण व खतरे के साए में ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर लाने के विचार किया जाय।


2. विचारानुसार किसी एक सुरक्षित स्थान को राहत शिविर या रिलीफ कैंप में बदलने का विचार किया गया है जहाँ उन्हें पूरी बरसात में रखा जाए और वहां उनके खाने पीने, दवाई, व कपडे दिए जाये I केदार घाटी के दो स्थान गुप्तकाशी घाटी व ऊखीमठ घाटी में सब – रिलीफ कैंप रखे जाने का सुझाव है, जो दोनों घाटी के आपदाग्रस्त गाँव में काम करेंगे या राहत कार्य करेंगे।


3. तत्कालीन राहत के दौरान जन नायक, जनकवि, प्रेरणा श्रोत बुद्दिजीवी, समाज सेवी, विभिन्न संघटन के संघर्ष शील व्यक्ति ग्रामीणों के साथ उनके मनोबल को बढाने का प्रयास करेंगे।


4. केंद्र बिंदु श्रीनगर को चुना गया है, यह स्थान संभावित स्थानों में सबसे उत्तम इसलिए माना गया क्यूँकी बरसात के किसी दौर में भी वो संपर्क में रहेगा और वहां संसाधनों को पहुचने में कोई दिक्कत नहीं होगी। चिकित्सा, से लेकर सारी सुविधायें वहां उपलब्ध हो सकती है।


दीर्धकालीन राहत :

रिलीफ कैंप के दौरान दो आपदाग्रस्त गाँव को चिन्हित कर गाँव को गोद लिया जायेगा जिसे एक आइडियल विलेज बनाने का प्रयास किया जाएगा, यह गाँव बिजली के लिए सोलर एनर्जी को वैकल्पिक रूप में तैयार किया जाएगा, पर्यावरण दृष्टीकोण के मद्देनजर इकोलॉजी व इकॉनमी का निर्माण किया जाएगा। स्थायी रोजगार के लिए पहाड़ के संसाधनों के अनुसार साधन खड़े किये जाने का प्रयास किया जाएगा, पर्यावरण को बढावा जो दे सके उस तरह के स्थायी रोजगार पर भी जोर दिया जाएगा।


1. चूँकि ग्रामीणों को असली राहत उनके अपने स्थानीय गाँव के पुनर्जीवित होने पर ही मिलेगी अत: बरसात के बाद गाँव में काम करने पर विचार किया गया है।


2. कुछ बुरी तरह प्रभावित गाँव को गोद लेके उनके पुनर्जीवित होने तक उनकी आजीविका, खाने और रहने का काम किया जाएगा।


3. वहां के नागरिकों के हिसाब से उनकी आजीविका के अनुसार उनकी आजीविका को खड़े करने में मदद करेंगे।


4. जब तक सरकार ग्रामीणों को घर बनाके देगी तब तक उन लोगों के लिए टिन शेड बना दिए जायेगे जहाँ वो रह सकें।


5. सामूहिक रूप से वहां के लोगों के लिए खाने की व्यवस्था और आपस में मदद करके गाँव को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाएगा।


6. इस कार्य के लिए स्थानीय जनता का सहयोग बखूबी मिलेगा।


प्रमुख बातें :


1.
सहायता स्वरुप सारे संघठनो से उम्मीद की जाती है वो इस कार्यक्रम में अपनी सहभागिता दें।


2. सहयता स्वरुप आर्थिक सहायता के बदले संसाधनों से सहायता करें।


3. राहत शिविर में आप अपनी उपस्तिथी भी दर्ज करायें।


4. ज्यादातर गाँव वासियों को संसाधनों से राहत पहुचायी जायेगी।


5. ग्रामीण इस भयावह मंजर को देख बहुत भयभीत है अत: उनको प्रेरित करना अति दुर्लभ कार्य है अत: हमें खुद उनके लिए काम करना होगा।


निम्नलिखित संसाधनों की आवश्यकता हेतु अपील :


1. टेंट / शेड : १०० व्यक्तियों के रहने हेतु ५ शेड, व १० व्यक्तियों के रहने हेतु १०० टेंट/शेड।


2. सोलर लालटेन।


3. सोलर लाइट : दो गाँव को बिजली उर्जा के वैकल्पिक रूप देने के लिए सोलर इक्विपमेंट।


4. बरतन किचन के कार्य के लिए (बनाने व खाने हेतु दोनों)।


5. ब्लीचिंग पाउडर।

6. कपडे : सभी कपडे नए हो व per-autumn season के हो, ज्यादातर लार्ज साइज़ के हो।


7. कैर्री बैग : जिसमे आंशिक प्रभावित गाँव के लोग आपदा राहत का सामान ले जा सके। 

8. जमीन में बैठने के लिए मैट।

9. Bedding's : कम्बल, चद्दर, गद्दे, इत्यादि।

10. दवाइयां।


11. छाते (umbrella)।


12. सिलिंडर के जगह अगर खाने पकाने के लिए कोई और तरीके हो तो वो भी सहायतार्थ उपलब्ध करायें।


13. पैक्ड मिल्क।

14. राशन लम्बे समय तक निरंतर उपलब्ध कराएं।


सामाजिक संगठन जिनके सहयोग से यह कार्यक्रम किया जा रहा है :


1. डीन- स्कूल ऑफ़ सोशल साइंस, हेमवती नंदन बहुगुणा विश्व-विद्यालय, श्रीनगर संपर्क: प्रो. जे.पी.पचौरी।

2. पर्वतीय विकास शोध केंद्र, श्रीनगर, संपर्क: डॉ. अरविन्द दरमोड़ा – 9411358378


3. रोटरी क्लब, श्रीनगर संपर्क: धनेश उनियाल : 9412079049


4. हिमालय साहित्य कला परिषद्, श्रीनगर, संपर्क: डॉ. उमा मैंठानी : 7579428846/9411599020


5. उत्तराखंड सोसाइटी फॉर नार्थ अमेरिकन, (U.S.A)


6. प्रमोद राघव, निस्वार्थ कदम – (U.S.A)


7. उत्तराखंड कौथिक ग्रुप, नयी दिल्ली: संपर्क – भरत बिष्ट – 8285481303


8. सल्ट समाज- दिल्ली

9. हिमालयन ड्रीमज ग्रुप, दिल्ली

10. उत्तराखंड जन जागृति संसथान, खाड़ी : संपर्क: अरण्य रंजन- 9412964003

11. क्रिएटिव उत्तराखंड, दिल्ली


12. उत्तराखंड विकास पार्टी – ऋषिकेश, संपर्क: मुजीब नैथानी – 9897133989, नरेन्द्र नेगी-9897496120


13. अल्मोड़ा ग्राम कमिटी, दिल्ली


14. सार्थक प्रयास, दिल्ली


15. हमर उत्तराखंड परिषद्, दिल्ली


16. उत्तराखंड चिंतन, दिल्ली


17. मेरु उत्तराखंड, दिल्ली


18. सस्टेनेबल एप्रोच ऑफ़ डेवलपमेंट फॉर आल (SADA), दिल्ली संपर्क : रमेश मुमुक्षु – 9810610400, बसंत पाण्डेय – 7579132181, डॉ. सुनेश शर्मा- 9456578242


19. प्रथा, ऋषिकेश – संपर्क: प्रभा जोशी : 9411753031, हरी दत्त जोशी: 9410103188

निवेदक :
(हिमालय बचाओ आन्दोलन)
राजीव नयन बहुगुणा: 9456502861, समीर रतूड़ी : 9536010510,
 हितेश पाठक: 8699023548, जगदम्बा प्रसाद रतूड़ी: 9412007059, चंद्रशेखर करगेती: 9359933346, दीप पाठक: 9410939421, हरीश बडथ्वाल: 9412029305, अनिल स्वामी – 9760922194, कृष्णा नन्द मैंठानी: 9456578209

Tuesday, 18 June 2013

ऊर्जा की राष्ट्रीय हवस और शिकार होता आम जन

रोहित जोशी

 "...हमारे देश में नीतियों के स्तर पर यह कितना त्रासद है कि हमारा 'राष्ट्रहित' जनता के हित से मेल नहीं खाता जब्कि कॉरपोरेट के हित 'राष्ट्रहितों' से एकदम मिलते हैं। ऐसा लगता है जैसे  कॉरपोरेट हित ही 'राष्ट्रहित' है और इसके लिए जनहितों की कुरबानी एक व्यवस्थागत् सत्य। इसलिए नदियों के जलागम में बसे समाजों की ओर से जबरदस्त प्रतिरोध का दमन करते हुए सरकारें देश भर की नदियों को बांध-बांध कर बांध परियोजनाऐं बनाती जा रही हैं।..."

उत्तकाशी में उफनती भागीरथी
चलिए हम आंख मूंदकर मान लेते हैं कि अबके उत्तरकाशी में और पिछले कुछ सालों से पूरे उत्तराखंड में लगातार प्राकृतिक आपदाओं ने जिस तरह जानलेवा होकर कहर बरपाया है, इनमें प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बेतहाशा बनाई जा रही झीलों का कोई योगदान नहीं है। लेकिन जिस गति से पूरे प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाएं और इनके लिए झीलें बनाई जा रही हैं इसी गति से प्राकृतिक आपदाएं भी साल दर साल खतरनाक होती जा रही हैं। ऐसे में इनके प्रभाव से हम कब तक आंखें मूंदे रह पाऐंगे?
पिछले दिनों उत्तरकाशी से ऊपर के इलाके में बादल फटने से भागीरथी और असीगंगा का जलस्तर पांच मीटर बढ़ गया और इससे पूरे उत्तरकाशी में भयंकर तबाही हुई। इसमें 300 से अधिक घर तबाह हो गए, 31 लोग मारे गए। 7 मोटरपुल ध्वस्त हो गए। ज्योश्याड़ा का महत्वपूर्ण झूला पुल भी टूट गया। 30 किमी की मुख्य सड़क पूरी तरह टूट गई। बाजार, पुलिस स्टेशन, फारेस्ट का फायर स्टेशन सब तबाह हो गया। मनेरी भाली परियोजना के फेज 2 में नदी के साथ बह कर आई लकडि़यों का झुण्ड भर गया जिससे परियोजना भी ठप पड़ गई। इसके बाद तो पूरे प्रदेश की सारी परियोजनाओं को एक दिन के लिए बंद कर देना पड़ा था।
पहाड़ में अब ये कोई नई बात नहीं रही। पिछले सालों में पूरे प्रदेश में बादल फटने की घटनाओं और इससे हुई तबाही में इस कदर बढ़ोत्तरी हुई है कि बरसात का मौसम पहाड़ों में दहशत का मौसम लगने लगा है। पूरे प्रदेश में ऐसा कोई जिला नहीं बच रहा है जहां इस मौसम में कोई बड़ी तबाही ना आई हो।
बादल फटना और भूस्खलन आदि बेशक अप्राकृतिक नहीं हैं। लेकिन जिस तरह पिछले समय में इन प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी हुई है यह सिर्फ प्राकृतिक नहीं है। दुर्लभ मानी जाने वाली बादल फटने की घटनाऐं, तबाही के वीभत्स मंजर के साथ इतनी आम हो चलीं हैं कि इसकी वजहों की पड़ताल की ही जानी चाहिए। बेशक मानावीय दखल ने ही इन प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ाया है। कई हजार सालों से सिर्फ बहते रहने की अभ्यस्त हिमालयी नदियों को जगह-जगह जबरन रोक कर जलविद्युत परियोजनाओं के लिए जब झीलें बना दी गई हों तो यहां के भूगोल और मौसम की ओर से कुछ प्रतिक्रियाएं तो स्वाभाविक ही हैं। तो हम ये क्यों ना मान पाएं कि प्रदेश भर में बादल फटने की बढ़ी घटनाओं और इनसे हुई तबाही के पीछे इन जलविद्युत परियोजनाओं का भी बड़ा हाथ है। 
बरसात और बरसात के बढ़कर ‘बादल फट’ जाने की स्थिति पैदा हो जाने को समझना राॅकेट साइंस की तरह जटिल नहीं है। हम बहुत शुरूआती कक्षाओं में विज्ञान की किताबों से इसे समझ सकते हैं। पानी के वाष्पन से बादल बनता है और फिर ये बादल बरस जाता है। यही बरसात है। और पहाड़ों में बादलों का भारी मात्रा में एक जगह जमा हो कर एक निश्चित इलाके में बेतहाशा बरसना बादल का फटना है। चंद मिनटों में ही 2 सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश हो जाती है। बादल फटने की घटना पृथ्वी से तकरीबन 15 किमी की ऊंचाई पर होती है। भारी नमी से लदी हवा पहाडि़यों से टकराती है इससे बादल एक क्षेत्र विशेष में घिरकर भारी मात्रा में बरस जाते हैं। यही बादल का फटना है। क्या पहाड़ में अप्रत्याशित रूप से बादल फटने की बढ़ी घटनाओं में पिछले समय में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बनाई कई कृत्रिम झीलों से हुए वाष्पन और इससे पर्यावरण में आई कृत्रिम नमी का कोई योगदान नहीं समझ आता? 
न्यू टिहरी शहर
पिछले महीने, मैं उत्तरकाशी और टिहरी जिलों में घूम रहा था। ‘न्यू टिहरी शहर’, एक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक शहर ‘टिहरी’ को डुबोकर तैयार की गई कंक्रीट की घिच-पिच। न्यू टिहरी में जाकर समझ आता है कि- एक शहर सिर्फ इमारतों का जखीरा भर नहीं होता, ‘कुछ और’ होता है जो उसे जिंदादिल शहर बनाता है। टिहरी झील ने इस ‘कुछ और’ को डुबो दिया है। और पुरानी टिहरी का जो कुछ बच रहा है वे न्यू टिहरी की बचकानी इमारतों के भीतर कसमसाता हुआ दम तोड़ रहा है। एक ग्रामीण कस्बाई शहर या गांव को उठाकर दूसरी जगह रख देना किसी मैट्रोपोलिटन शहर में एक फ्लैट या अपार्टमैंट से दूसरे में शिफ्ट कर जाने सरीखी सामान्य घटना नहीं है। शहर/गांव को उठाने की कोशिश में उसकी चासनी वहीं निथर जाती है और नई जगह रसहीन लोथड़ा ही पहुंच पाता है। न्यू टिहरी ऐसा ही सूखा शहर है। 
न्यू टिहरी में बरसात बहुत है। पुराने लोग बताते हैं कि जब टिहरी शहर था, वहां झील नहीं थी, तो इस झील के बगल की पहाड़ी में, जहां अब न्यू टिहरी शहर बना दिया गया है, बरसात बहुत कम होती थी। लेकिन 40 किमी की झील के बनने के बाद वहां इससे हुए वाष्पन से बादल बनता है और बहुत बरसात होती है। इस घटना को स्थानीय बोलचाल में ‘लोकल मानसून’ का उठना कहते हैं। यूं ही ढेर सारी प्राकृतिक झीलों वाले जिले नैनीताल में भी इसी तरह ‘लोकल मानसून’ से बारिश बहुत होती है। बेशक झीलों का पहाड़ों में बरसात को लेकर अपना रोल है। प्राकृतिक झीलों का तो अपना व्यवहार है, जो अक्सर संतुलित रहता है। लेकिन कृतिम झीलों के साथ प्रकृति अपना व्यवहार संतुलित नहीं बना पा रही है। इसका प्रतिफल बादल फटने और बादल फटने से हुए भूस्खलनों के रूप में दिखता है जिससे हर साल भीषण तबाही हो रही है। हिमालय दुनिया के सबसे ताजा पहाड़ों में है जिसकी चट्टानें अभी मजबूत नहीं हैं। एक तो यह वजह है और दूसरी वजह, जलविद्युत परियोजनाओं के लिए टनल निर्माण में पहाड़ों को विस्फोटकों के प्रयोग से जिस तरह खोखला और कमजोर कर दिया गया है, इन दो वजहों से ना सिर्फ बादल फटने बल्कि सामान्य बरसात में भी भूस्खलन त्रासदी बन रहा है।
टिहरी जैसे दानवाकार बांध के साथ ही पूरे प्रदेश की 17 नदियों में तकरीबन 558 बांध प्रस्तावित हैं। इनमें से कुछ बन भी चुके हैं और कुछ निर्माणाधीन हैं। ये बांध अक्सर बड़े बांधों के निर्धारित मानक में ही आते हैं। इन बांधों के लिए पहाड़ों को खोखला कर 1500 किमी की सुरंगें बनाई जाएंगी। इन सुरंगों को बनाने में विस्फोटकों का प्रयोग होगा और इससे पहाड़ जितने कमजोर होंगे, सो अलग। 
जिस उत्तरकाशी में आज बादल फटने से भागीरथी उफान में आ गई है यहां मनेरी भाली बांध परियोजना (फेज-1 और फेज-2) की दो झीलें हैं (एक तो बिल्कुल शहर में और दूसरी इसी नदी में शहर से कुछ ऊपर)। इसी नदी के सहारे आप तकरीबन 25-30 किमी नीचे उतरें तो चिन्यालीसौड़ में ‘विकास की महान प्रतीक’, 40 किमी लम्बी ‘टिहरी झील’ भी शुरू हो जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले समय में इस पूरे इलाके में बरसात काफी बढ़ी है। और ऐसे ही अनुभव हर उस इलाके के हैं जहां विद्युत परियोजनाओं के लिए कृत्रिम झीलें बनाई गई हैं।
टिहरी झील
चलिए हम एक बार फिर आंख मूंद लेते हैं, और मानने की कोशिश करते हैं कि अब तक जो प्राकृतिक आपदाऐं हुई हैं ये अपने सहज स्वरूप में ही हुई हैं और इसमें ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का कोई हाथ नहीं है। लेकिन तो भी क्या भविष्य में बनने वाली 558 जल विद्युत परियोजनाओं की झीलें, हमारी उपरोक्त आशंकाओं पर हमें सोचने को मजबूर नहीं करती हैं? और यदि इस आशंका पर सोचना होगा तो स्वाभाविक ही इस बात पर भी सोचना होगा कि इन खतरनाक परियोजनाओं के लिए लालायित सरकारों और बांध बनाने वाली कंपनियों के वे कौन से हित हैं जो पहाड़ी समाज को इन तबाहियों मंे धकेलने को प्रेरित कर रहे हैं।  

पिछले दौर में पर्यावरण को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंताएं बढ़ी हैं और अंतराष्ट्रीय संगठनों के विविध सम्मेलनों में पर्यावरणीय चिंताएं ही केंद्र में रही हैं। इन सम्मेलनों में मुख्य फोकस अलग-अलग देशों द्वारा  CO2  और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने को लेकर दबाव बनाने का रहा है। खासकर कम औद्यौगीकृत और विकासशील, तीसरी दुनिया के देशों पर यह दबाव ज्यादा है। क्योंकि ये देश इन गैसों का उत्सर्जन अपने औद्यौगिक विकासरत् होने के चलते अधिक करते हैं। इन्हीं देशों के क्रम में भारत भी है। भारत सबसे अधिक CO2 उत्सर्जित करने वाले देशों में पांचवे स्थान पर है और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में यह स्थान सातवां है।
जल विद्युत परियोजनाओं के बारे में माना जाता है कि इसमें कार्बन का उत्सर्जन कम होता है और प्राकृतिक जलचक्र के चलते पानी की बरबादी किए बगैर ही इससे विद्युत ऊर्जा उपलब्ध हो जाती है। वहीं कोयले या अन्य ईधनों से प्राप्त ऊर्जा में मूल प्राकृतिक संसाधन बरबाद हो जाता है और कार्बन का उत्सर्जन भी अधिक होता है। इस कारण विश्व भर में पर्यावरणविद् ऊर्जा प्राप्त करने की सारी ही तकनीकों में से हाइड्रो पावर की वकालत करते हैं। यही कारण है कि भारत भी अन्तराष्ट्रीय स्तर पर  CO2 और ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित करने के मामले अपनी साख सुधारने के लिए हाइड्रो पावर की ओर खासा ध्यान दे रहा है। पिछले समय में ऊर्जा आपूर्ति की कमी ही भारत की विकासदर को तेजी से बढ़ाने के लिए सबसे बढ़ी रूकावट रही है। एक अनुमान के अनुसार पिछले दो दशकों में भारत की ऊर्जा जरूरत 350 प्रतिशत बढ़ी है। इसका मतलब यह है कि भारत को अपनी ऊर्जा उत्पादन की वर्तमान क्षमता से तीन गुना अधिक ऊर्जा की आवश्यकता है। सवाल यह है कि यह कहां से पूरी होगी? जब्कि यह आवश्यकता यहीं पर स्थिर नहीं है बल्कि लगातार बढ़ती जा रही है। 
खैर! अंतर्राष्ट्रीय दबाव में भारत का फोकस अभी कार्बन का उत्सर्जन कम कर अधिकतम ऊर्जा प्राप्त कर लेने में है और इसके लिए हाइड्रो पावर परियोजनाएं ही मुफीद हैं। यही राष्ट्रहित में है। हमारे देश में नीतियों के स्तर पर यह कितना त्रासद है कि हमारा ‘राष्ट्रहित‘ जनता के हित से मेल नहीं खाता जब्कि  कॉरपोरट के हित ‘राष्ट्रहितों’ से एकदम मिलते हैं। ऐसा लगता है जैसे  कॉरपोरट हित ही राष्ट्रहित है और इसके लिए जनहितों की कुरबानी एक व्यवस्थागत् सत्य। इसलिए नदियों के जलागम में बसे समाजों की ओर से जबरदस्त प्रतिरोध का दमन करते हुए सरकारें देश भर की नदियों को बांध-बांध कर बांध परियोजनाऐं बनाती जा रही हैं। कार्बन के उत्सर्जन मामले में यह हाइड्रोपावर परियोजनाएं चाहे पर्यावरण पक्षधर दिखती हों लेकिन अनुभव और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए कई सर्वेक्षण बताते हैं कि इन बांध परियोजनाओं ने किस तरह से मानवीय त्रासदियों को तो जन्म दिया ही है साथ ही प्रकृति के साथ भी बड़ी छेड़छाड़ की है। इससे मानव सभ्यता के इतिहास में अहम रही कई नदियों के जलागम, पर्यावरण और जैवविविधताओं पर भी गहरा असर पड़ा है। इन नदियों के किनारे बसा इन्हीं पर निर्भर समाज भी अपने पूरे अस्तित्व के साथ संकट में घिर गया है। वल्र्ड कमिशन ऑफ डैम्स (डब्लु सी डी) की एक रिपोर्ट कहती है कि बांध जरूर कुछ ‘‘वास्तविक लाभ’’ तो देते हैं लेकिन समग्रता में इन बांधों के नकारात्मक प्रभाव ज्यादा हैं जो कि नदी के स्वास्थ, प्रकृति, पर्यावरण और लोगों के जीवन को बुरी प्रभावित करते हैं। इसी से प्रभावित करोड़ों लोगों की पीड़ा और तबाही के प्रतिरोध में बांधों के खिलाफ दुनिया भर में आंदोलन उभरे हैं। भारत में भी यह प्रतिरोध भारी है। खासकर पूरे हिमालय में जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तरपूर्व तक जनता इन बांधों के खिलाफ आंदोलित है। सरकारी दमन चक्र, प्रतिरोध की तीक्ष्णता के आधार पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तीव्रता से दमन चलाए हुए है। फिर भी अपने अस्तित्वसंकट से जूझ रही जनता का आंदोलन अनवरत् जारी है। 
सरकार द्वारा भारत में बांध परियोजनाओं को महत्ता देने की उपरोक्त वजह के अलावा पावर प्रोजेक्टों का बेहिसाब मुनाफा वह दूसरी महत्वपूर्ण वजह है जिसके लिए पहाड़ी/प्रभावित समाज की अनदेखी कर सरकारें और बांध बनाने वाली कंपनियां बांधों को लेकर इतनी लालायित हैं। विद्युत ऊर्जा की मांग असीम है और पूर्ति सीमित। मांग और पूर्ति के सिद्धांत के अनुसार विद्युत ऊर्जा की मांग अधिक और पूर्ति कम होने के चलते इसका मूल्य अधिक है। और यह स्थिति स्थाई भी है। ऐसा कभी नहीं होने जा रहा कि विद्युत ऊर्जा की पूर्ति ज्यादा हो जाए और मांग कम रहे। यानि विद्युत उत्पादन उद्योग में निवेश बाजार की स्थितियों के अनुरूप बिना किसी जोखिम के मुनाफे का सौदा है। यही वजह है कि कंपनियां इसमें निवेश को लालायित हैं और दलाल सरकारें उन्हें भरपूर मदद पहुंचा रही हैं।
भारत में शुरूआती दौर में बनी बांध परियोजनाओं का उद्देश्य सिर्फ विद्युत उत्पादन नहीं था। यह बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजनाएं थी। जिनका मकसद नदी के समग्र जलागम को, बाढ़ से बचाव, सिंचाई, मत्स्य पालन और जल पर्यटन आदि के लिए विकसित करना हुआ करता था। विद्युत उत्पादन इसका महज एक हिस्सा था। लेकिन पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में उदारीकरण के बाद से जिस तरह सभी क्षेत्रों में जनकल्याण की जगह मुनाफाखोरी ने ले ली है उसी तरह बांध परियोजनाएं भी इसकी ही भेंट चढ़ गई हैं। विद्युत उत्पादन ही बांध परियोजनाओं का एक मात्र मकसद हो गया है। बिना सरोकारों और सिर्फ मुनाफाखोरी के लिए बन रही इन परियोजनाओं का एक दूसरा संकट पर्यावरण संबंधी मानकों की अंदेखी कर काम की गुणवत्ता और सावधानियों के प्रति लापरवाही बरतना भी है। जिसके चलते कम जोखिम वाली मझोले और छोटे आकार की बांध परियोजनाएं भी खतरनाक हो गई हैं। क्योंकि सरकार और विपक्ष दोनों की ही ओर से इन परियोजनाओं को जैसा प्रश्रय मिला हुआ है उससे इस संदर्भ में किसी भी जांच और कार्यवाही का कोई सवाल ही नहीं उठता। रही बात कॉरपोरट  मीडिया की तो उसका चरित्र किससे छुपा है? इन कंपनियों के विज्ञापनों की बाढ़/आस में उसकी जुबान पहले से ही बंद है। लेकिन इधर हिमाचल हाईकोर्ट के, जेपी ग्रुप (जेपी एसोसिएट्स) के खिलाफ 100 करोड़ के हर्जाने के, लिए गए एक फैसले का संदर्भ इन कंपनियों की मुनाफा बटोरने के लालच की हद और धूर्तता को समझने के लिए लिया जा सकता है।

सोलन स्थित जेपी कंपनी का सीमेंट प्लांट और कॉलोनी
जेपी एसोसिएट्स, भारत की सीमेंट, हाइड्रो पावर और थर्मल पावर उत्पादन के क्षेत्र में प्रतिनिधि निजी कंपनी है। अलग-अलग परियोजनाओं में, हाइड्रो पावर में 1700 मेगावाट और थर्मल पावर में 5120 मेगावाट के लिए इसके द्वारा निर्माण कार्य कराया जा रहा है। साथ ही देश में सीमेंट उत्पादन में इसका चौथा स्थान है। हिमालयी राज्यों में भी जेपी के कई प्रोजेक्ट काम कर रहे हैं। हिमाचल हाईकोर्ट का यह फैसला एक जनहित याचिका के संदर्भ में आया है जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा कंपनी पर उसके सोलन स्थित सीमेंट प्लांट में पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। कंपनी ने इस प्लांट के लिए पर्यावरण संबंधी कोई भी क्लियरेंस यह कहते हुए नहीं लिया था कि इस प्लांट में 100 करोड़ से कम निवेश है जबकि क्लियरेंस की जरूरत 100 करोड़ से ऊपर के निवेश में पड़ती है। बकायदा इस संदर्भ में जेपी की ओर से एक फर्जी शपथपत्र भी दायर किया गया था जिसमें प्लांट में 100 करोड़ से कम का निवेश होने की बात कही गई थी। लेकिन याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट के सामने यह साबित कर दिया कि यह प्लांट 100 करोड़ का नहीं जबकि 400 करोड़ का है। इसी पर फैसला देते हुए हिमांचल प्रदेश हाईकोर्ट की ग्रीन बैंच ने जेपी को फर्जी शपथपत्र के लिए फटकार लगाते हुए उस पर 100 करोड़ का हर्जाना भरने का आदेश दिया। साथ ही कोर्ट ने सोलन में ही स्थित जेपी के थर्मल पावर प्लांट को अगले तीन महीनों में बंद कर देने के आदेश दिए हैं क्योंकि ये प्लांट भी बिना किसी मान्य पर्यावरणीय क्लीयरेंस के ही बनाया गया है। निजी कंपनियों के लिए इस तरह की धोखेबाजी करना आम बात है। पर अफसोस की बात तो ये है कि लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका और जनता के साथ स्पष्ट धोखा करने के बावजूद भी बाजार में इससे जेपी की साख पर कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला। चाहे न्यायालय ने इस सब के लिए जेपी को 100 करोड़ का हर्जाना भरने की सजा सुना दी हो। लेकिन क्या इस धोखेबाजी की भरपाई महज इस सजा से हो सकती है? 

इस फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा है कि इतनी बड़ी अनियमितता बिना प्रशासनिक अधिकारियों की मिली भगत् के संभव नहीं हो सकती। कोर्ट ने इसकी जांच के लिए एक विशिष्ट जांच दल (एसआईटी) भी बिठाया है। देश भर में बांध परियोजनाएं ऐसी ही धोखेबाज कंपनियों के हाथों में हैं जो शासन और प्रशासन के लोगों को खरीद कर बिना किसी सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों के प्राकृतिक संसाधनों को सिर्फ अपने मुनाफे के लिए बुरी तरह लूट रही हैं। पर्यावरणीय नुकसानों के साथ ही इसकी कीमत स्थानीय जनता को अपने पूरे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अस्थित्व को दाव पर लगाकर चुकानी पड़ रही है।
अब सवाल यह उठता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर CO2 और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के दबावों और अपने विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की समस्या से भारत कैसे उबरे? इसके दो जवाब हैं, पहला कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के कम उपभोग की ओर कोई बहस करने को तैयार नहीं है। जब्कि हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति के पास सीमित संसाधन हैं, जिनका संभल कर उपयोग करना होगा। पूंजीकेंद्रित अर्थव्यवस्थाओं में मुनाफा कमाने की होड़ के चलते लगातार ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही हैं और इसके लिए दुनियाभर की सरकारें और औद्यौगिक घराने आंखमूंद कर हाथ पांव मार रहे हैं। इसकी चोट वर्तमान में प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न क्षेत्रों पर पड़ रही है जहां कि अक्सर आदिवासी या तथाकथित पिछड़ा समाज, प्रकृति से साम्य बना कर बसा हुआ है। विकास की पूंजीकेंद्रित समझदारी उसे तबाह करते हुए अपनी जरूरतें पूरी कर लेना चाहती हैं। ऐसे में भारत को, किसी भी कीमत पर ऊर्जा हासिल कर लेने की वैश्विक होड़ में शामिल हुए बगैर, मानवकेंद्रित रवैया अपनाते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों को सीमित करने की ओर बढ़ना होगा। दरअसल पूरे विश्व को यही करने की जरूरत है।
दूसरा जवाब यह है कि ऊर्जा जरूरतों को सीमित कर देने के बाद जिस ऊर्जा की जरूरत हमें है, उसे जुटा लेना भारत जैसे प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न देश के लिए मुश्किल नहीं होगा। वर्तमान परिदृश्य में हाइड्रो पावर के अलावा पर्यावरण सम्मत कोई विकल्प नजर नहीं आता (इसकी वजह यह भी है कि निहित स्वार्थों के चलते ऊर्जा के कई सुलभ, पर्यावरणपक्षीय और कम खतरनाक स्रोतों के क्षेत्र में कोई भी शोध/अध्ययन नही ंके बराबर हो रहे हैं)। ऐसे में यदि हमें हाइड्रोपावर से ही ऊर्जा जुटानी होगी तो, जरूरत है कि हाइड्रो पावर परियोजनाओं को अधिकतम् जनपक्षीय और पर्यावरणसम्मत् बनाया जाय। इस क्षेत्र को निजी कंपनीयों को मुनाफा कमाने के लिए खुली छूट के तौर पर नहीं दिया जा सकता। यह जरूर तय करना होगा कि हाइड्रो पावर उत्पादन में नदियों के किनारे बसा स्थानीय समाज, पहाड़ों का भूगोल और पर्यावरण तबाह ना हो जा रहा हो। इसके साथ प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक उस समाज का ही होना चाहिए जिसने कि इस भूगोल को उसकी सम-विषम परिस्थितियों के साथ, अपने जीने के लिए चुना है। ऐसे में पहाड़ों में किसी भी किस्म की जल विद्युत परियोजनाओं में पहाड़ी समाज की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। डब्लु सी डी की रिपोर्ट भी यही कहती है। बांधों के निर्माण के लिए बड़ी सामाजिक कीमत ना चुकानी पड़े इसके लिए डब्लूसीडी की रिपोर्ट में कुछ निर्देश दिए हैं जो कि बांध निर्माण संबंधी निर्णयों को कुछ विशिष्ठजनों द्वारा लिए जाने के बजाय प्रभावित जनता के साथ भागीदारी का रवैया बनाने की वकालत करती है। इसी तरह के कुछ प्रयोग, बड़ी और गैरजनपक्षीय बांध परियोजनाओं का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड में करने की कोशिश की है। यहां जनभागीदारी से छोटी जल विद्युत परियोजनाएं बनाने के क्षेत्र में काम किया जा रहा है। इन आंदोलनकारियों ने इन परियोजनाओं के लिए एक बजट मॉडल भी विकसित किया है। जिसके अनुसार 1 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना की लागत 4 करोड़ रूपये होगी। इस धन को आसपास के गांवों के 200 लोगों की सहकारी समिति बनाकर बैंक लोन आदि तरीकों से जुटाया जाएगा। इस सहकारी समिति के 200 सदस्य ही इस परियोजना के शेयरधारक होंगे। बजट के अनुसार 1 मेगावाट की विद्युत इकाई से यदि सिर्फ 800 किलोवाट विद्युत का उत्पादन भी होता है तो वर्तमान बिजली के रेट 3.90 रूपया प्रति यूनिट के हिसाब से एक घण्टे में 3120.00 रूपये, 24 घण्टे में 74,880.00 रूपये और एक माह में 22,46,400.00 रूपये की इन्कम होगी। इसी तरह यह आंकडा, सालाना 2,69,56,800.00 रूपये हो जाएगा। ढाई करोड़ से ऊपर की इस सालाना कमाई से इन गांवों की आर्थिकी सुदृढ़ हो सकती है। ये गांव स्वावलम्बी बन सकते हैं। बजट के अनुसार लोन की 4 लाख प्रतिमाह की किस्तों को भरने के अलावा, परियोजना के 10 से 15 लोगों के स्टाफ की 3.25 लाख प्रति माह तन्ख्वाह, मेंटेनेंस के 2.50 लाख के साथ ही 200 शेयर धारकों को 5000 से 8000 रूपया प्रतिमाह शुद्ध लाभ भी होगा। एक बार हाइड्रो पावर परियोजनाओं का निर्माण कार्य पूरा हो जाय तो उसके बाद इससे ऊर्जा प्राप्त कर लेना बेहद सस्ता होता है। नदियों में बहता पानी इसके लिए सहज प्राप्य कच्चा माल होता है। पहाड़ी गांवों में यदि इस तरह की परियोजनाएं जनसहभागिता से स्थापित हो जाएं तो यह विकास का स्थाई/टिकाऊ तरीका हो सकता है।
लेकिन इस तरह की परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने के कोई भी प्रयास ‘ऊर्जा प्रदेश’ की सरकार नहीं कर रही है। उसके सपनों में तबाही फैलाते बड़े डैम हैं और मध्य एशिया के देशों के ‘पैट्रो डॉलर’ की तर्ज पर इन डैमों से बरसता ‘हाइड्रो डॉलर’। उलटा सरकारें इन परियोजनाओं को हतोत्साहित करने में तुली हुई हैं। दो साल पहले उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सीमांत गांव रस्यूना में सरयू नदी में इसी तरह की एक मेगावाट की एक परियोजना के लिए शोध करने गए, गांधीवादी, आजादी बचाओ आदोलन से जुड़े इंजीनियर और एक कार्यकर्ता को पुलिस ने माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया। मार-पीट/पूछताछ के बाद कुछ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों की पहल पर उन्हें छोड़ा गया। यह उदाहरण है कि किस तरह कॉरपोरट के फायदे के इतर वैकल्पिक मॉडलों पर काम कर रहे लोग दमन का सीधा शिकार हो रहे हैं। इस तरह के वैकल्पिक मॉडल खड़े हो जाना सरकार और मुनाफाखोर निजी कंपनियों को मंजूर नहीं हैं।  

सरयू घाटी के आंदोलित लोग
बारहवी पंचवर्षीय योजना, 2012-2017 के दौरान भारत ने अपनी ऊर्जा क्षमता में एक लाख मेगावाट का अतिरिक्त इजाफा करने का लक्ष्य रखा है। यह जनपक्षीय और पर्यावरणसम्मत् दृष्टि से बिल्कुल असंभव है। और 1 मेगावॉट सरीखी छोटी परियोजनाएं तो इस लक्ष्य को पाने में नगण्य भूमिकाएं ही अदा करेंगी। तो सरकारों का फोकस स्वाभाविक ही मझोली और बड़ी परियोजनाओं की ओर जाना तय है। ऐसे में मझोली परियोजनाएं तो बनेंगी ही साथ ही अतीत की चीज मान ली गई बड़ी बांध परियोजनाओं की दुबारा से भयंकर शुरूआत होगी। और यदि ऊर्जा उत्पादन के इस लक्ष्य को भारत को किसी भी कीमत पर पा ही लेना है तो इसका एकमात्र रास्ता प्रभावित समाजों के प्रतिरोधों का बर्बर दमन करते हुए मनमानी ऊर्जा परियोजनाओं को खड़ा करना ही होगा। भारत का विकास रथ जिस ओर बढ़ रहा है, प्राकृतिक संसाधन संपन्न क्षेत्रों की ओर उसका जो रवैया है ऐसे में यह बर्बर दमन अकल्पनीय नहीं है। जनता और आंदोलनकारियों को कमर कस लेनी चाहिए। 

Monday, 16 April 2012

उत्तराखंड में शराब विरोधी आन्दोलन और तस्करी.



हाल ही में कुमायूं, गढ़वाल  की छोटी-बढ़ी जगहों में शराब विरोधी आन्दोलन जोरों पर था और शायद है भी. हमेशा की ही तरह शराब विरोधी मोर्चा की शुरुवात महिलाओं ने ही की है. सभी जगहों पर महिलाएं उग्रता से शराब के ठेकों को बंद करवाने की मांग कर रही हैं. बाकायदा पहल न्यूज़ पेपर इत्यादि में छाई हुई है. महिलाओं में शराब के प्रति रोष फूट-फूट कर बाहर निकल रहा है.

        कहने को तो ये आन्दोलन पूरे  कुमायूं को शराब मुक्त बनाने को है पर इस आन्दोलन को देखते हुए आज से कुछ ६ साल पहले का एक आन्दोलन याद आ जाता है, जो सफल होते हुए भी असफल हो गया. इस घटना से शायद आप सभी परिचित होंगे.

     सन २००६ मई-जून का महिना होगा, गंगोलीहाट जो  पिथोरागढ़ जिले की एक तहसील है में भी शराब की दुकानों को बंद करने के लिए एक उग्र आन्दोलन हुआ. जिसमें गंगोलीहाट की सारी जनता ने बराबर सहयोग दिया, कुछ अप्रिय घटनायें भी इसमें घटी, यहाँ तक कि एक आन्दोलनकारी महिला के साथ बलात्कार की घटना भी सामने आई.

         लोकल और नेशनल न्यूज़ चैनलों और अखबारों में ये आन्दोलन छाया रहा और ज्यादा प्रबल बनता गया. काफी संघर्ष के बाद ये आन्दोलन सफल हो गया. गंगोलीहाट से शराब की सारी दुकानें बंद करवा दी गयी. परन्तु गंगोलीहाट से शराब नहीं हट सकी. "भाई जो आदमी शराब का लती है या जो शराब पिता है उसे तो शराब चाहिए ही चाहिए", और शराब मिलने की अब दो ही सूरतें बची...
१- शराब के ठेके का खुलना जो संभव नहीं.
२- शराब की तस्करी.

          बहरहाल गंगोलीहाट में शराब के तस्कर पाँव पसारने लगे. तस्करी का गोरखधंधा तो चल ही पढना था, सो चल पढ़ा. शुरवात में बेरीनाग और पिथोरागढ़ अदि नजदीकी जगहों से शराब की तस्करी की जाने लगी, तस्करी के पैर जैसे ही पसारने लगे तो शराब की तस्करी हरियाणा और पंजाब से भी होने लगी. सस्ते दामों में शराब को लाकर दुगने दामों में बेचा जाने लगा. कल तक जो लोग दो वक़्त की रोटी के भी मोहताज थे वे शराब तस्करी की बदोलत आज चोपहिया गाड़ियों में घूम रहे हैं.

            तस्करी बढती गयी लेकिन किसी प्रसासनिक अधिकारी ने तस्करी रोकने का प्रयास नहीं किया.
        ख़ास बात तो ये है की किसी भी प्रसासनिक अधिकारी ने तस्करी को लेकर कोई कदम क्यों नहीं उठाया? क्यों ये सब तस्करों के आगे चुप दिखाई देते हैं? देखा जाये तो यहाँ आने वाले प्रसासनिक अधिकारीयों को उनकी निजी ज़िन्दगी के लिए मीडिया में छाया रहना ज्यादा अच्छा लगता है न की तस्करी को रोककर मीडिया और देश में नाम कमाना. सुनने में आ रहा है कि गंगोलीहाट में शराब की दूकान फिर से खुल रही हैं. क्या फायदा ऐसे आन्दोलन का? ये तो आजादी मिलने के बाद भी ग़ुलाम होने कि तरह है.
  
    बात गंगोलीहाट की ही नहीं है, आज जहाँ कहीं भी शराब विरोधी आन्दोलन की बात आती है तो गंगोलीहाट  में होने वाली शराब तस्करी की तस्वीर सामने आ जाती है. हमें ये समझना होगा की केवल शराब के ठेके बंद करवाने से कुछ नहीं होगा, बल्कि प्रशासन और तस्करी के खिलाफ भी खड़ा होना होगा. लोगों को पहले ये सोच लेना होगा कि वे शराब को ख़त्म करना चाहते हैं या तस्करी को बढ़ावा देना चाहते हैं.