Saturday, 16 February 2013

मेरे कौमार्य से कीमती मेरा जीवन है : सोहेला अब्दुलाली


-पुष्यमित्र

(इस आलेख के दो हिस्से हैं. लेखक ने पहले हिस्से में कन्फ्यूशियस के एक तीखे बयान के बहाने बलात्कार के प्रति समाज की पित्रसत्तात्मक मनःस्थिति को कठघरे में खड़ा किया है और दूसरे हिस्से में उन्होंने मुंबई में बलात्कृत हुई महिला सोहेला अबुदाली के आलेख का अनुवाद शामिल किया है जिनका सपष्ट मानना है कि "...हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है...." यह आलेख दिल्ली गैंग रेप केस के बाद बलात्कार और उसके इर्द-गिर्द उठ खड़ी हुई बहसों को एक सटीक दिशा देता है. पढ़ें... 
-मॉडरेटर)



पुष्यमित्र
प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस बलात्कार के बारे में कहा है कि अगर कोई स्त्री बलात्कारियों के चंगुल में फंस जाये तो पहले तो उसे उन बलात्कारियों का विरोध करना चाहिये. पर जब लगे कि विरोध करने से भी उनके इरादे बदले नहीं जा सकते, तो फिर स्त्री को बलात्कार का मजा लेना चाहिये. निश्चित तौर पर यह एक बहुत क्रूर सलाह है. क्योंकि मजा तो स्त्रियां अपने पति की जबरदस्ती का भी नहीं ले पातीं. हालांकि वे अनिच्छा से बरसों इसे झेलती रहती हैं. अधिकांश मामलों में मना भी नहीं करतीं और पति समझ भी नहीं पाता कि इतने सालों तक उसने अपनी पत्नी के साथ जो किया वह प्रेम नहीं बल्कि शारिरिक अत्याचार था. खैर, वह अलग संदर्भ है, यहां संदर्भ दूसरा है. अत्यधिक क्रूर होने के बावजूद मेरे मन में कंफ्यूशियस की यह उक्ति सालों से चक्कर खा रही है. हाल की घटनाओं के बाद छिड़ी बहस में कई दफा मैंने चाहा कि इन पंक्तियों को अपने मित्र समुदाय के बीच सोशल मीडिया में साझा करूं मगर हर बार कुछ सोच कर अपना इरादा बदल देता. पर दो दिन पहले एक बलात्कार पीड़ित युवती का आलेख पढ़ने को मिला. सोहेला अब्दुलाली, उनके साथ 1983 में गैंगरेप हुआ था. बाद में मानुषी नामक पत्रिका में उन्होंने एक आलेख लिखा जिसमें उन्होंने गैंगरेप के अपने अनुभव और रेप से संबंधित दूसरी बातों के बारे में लिखा है. कई मित्रों की तरह मैं भी मानता हूं कि यह मस्ट रीड टाइप आलेख है. इसलिए मूलतः अंग्रेजी में लिखे गये इस आलेख का मैंने हिंदी में अनुवाद किया है.

मगर इस आलेख से पहले कुछ अपनी बात भी कहना चाहूंगा. खास तौर पर कंफ्यूशियस की उस उक्ति के संदर्भ में. कंफ्यूशियस को चीन में कमोबेस वही स्थान हासिल है जो अपने देश में चाणक्य और पश्चिमी देशों में मैकियावेली को. वे सीधी सपाट और बेलाग शब्दों में समाधान पेश करते हैं. अगर मुझे उनकी उस उक्ति पर कुछ कहना हो तो सिर्फ इतना कहूंगा कि मजा लेने के बदले अगर उन्होंने झेल लेना लिखा होता यह और भी सटीक होता. क्योंकि मेरे हिसाब से बलात्कार कतई एक क्षुद्र किस्म की क्षति से अधिक नहीं है. इतनी भी नहीं कि इसे आपकी कानी उंगली के कटने के बराबर माना जाये. हालांकि मैं यहां स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं यह बात क्षति के संदर्भ में कह रहा हूं, न तो यंत्रणा के संबंध में और न ही अपराध के मसले पर नहीं.

किसी भी व्यक्ति की यौन स्वतंत्रता के अतिक्रमण को एक सर्वाधिक घृणित अपराध के रूप में देखा जाना चाहिये, और उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा होनी ही चाहिये. मगर साथ ही इस क्षति के आकलन पर पुनर्विचार भी करने की जरूरत है. क्योंकि यह पुनर्विचार उसके लिए अपराध का सामना करते वक्त और उसके बाद के जीवन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. अधिकांश पीड़ित महिलाएं विरोध करते वक्त बड़ा शारिरिक नुकसान झेलती हैं, जैसा कि इस केस में हमने देखा कि उस युवती को जान तक गंवानी पड़ी. कई पीड़ित बाद में जान दे देती हैं, क्योंकि उनकी और समाज की नजर में बलात्कार का अर्थ उनकी इज्जत का चला जाना है. और इसके बाद जीना निर्रथक होता है. मगर क्या सचमुच यह इतना निर्रथक है. इस दुनिया में स्टीफन हाकिंग्स जैसा शारिरिक तौर पर अक्षम व्यक्ति अपनी हर महत्वाकांक्षा की पूर्ति करते हुए जी सकता है, वहां एक दफा किसी यौन कुंठित अपराधी के हमले के बाद कोई भला ऐसा क्या हो जाता है कि कोई व्यक्ति जीने लायक नहीं बचता है.

इज्जत, यह जो शब्द है. बहुत पुराना और सर्वव्यापी शब्द है. हमारी दुनिया में बलात्कार ही एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें दोषी की इज्जत का तो पता नहीं, पीड़ित की इज्जत निश्चित तौर पर चली जाती है. देश में चल रहे महिला आंदोलनों ने कभी इस सवाल को बहुत गंभीरता से नहीं देखा, आज भी वे बलात्कार के बाद पीड़ित को हुई मानसिक क्षति को काफी बड़ा मानकर उसके लिए सजा की मात्रा बढ़ाने की मांग कर रही हैं. मगर वे कतई यह नहीं सोचतीं कि इस अपराध को सबसे पहले इज्जत के ठप्पे से मुक्त करने की जरूरत है. यह जो इज्जत इस अपराध के बाद जाती है, वह किसकी है? उस औरत की कतई नहीं जो शादी के बाद इस इज्जत को अपने पति को समर्पित कर देती है. यह इज्जत उस पुरुष की है, जिसे समाज पिता-भाई और पति के तौर पर स्त्री का स्वामी समझता है. इस समाज में औरतों का यौन संक्रमण उसकी इज्जत से जुड़ा है, जबकि पुरुषों का यौन संक्रमण हाल-हाल तक घर की औरतों द्वारा ही नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है.

सबसे पहले तो इज्जत के इस दोहरे मानदंड को खत्म करने की जरूरत है. रेप एक हादसा है इससे अगर किसी की इज्जत जाने की संभावना होनी चाहिये तो उस रेपिस्ट की जो किसी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करता है. ठीक उसी तरह जैसे एक चोर, एक पाकेटमार, एक घोटालेबाज की इज्जत चली जाती है. एक बार यह तथ्य स्थापित हो जाये तो फिर स्त्री जाति के लिए बलात्कार के हमले का सामना और उसके बाद का जीवन आसान हो जायेगा. फिर स्त्रियां यौन हमलों का सामना दृढ़ता से कर पायेंगी. 

अब आपके सामने पेश है सोहेला का यह आलेखः

“मैं अपनी जिंदगी के लिए लड़ी... और जीत हासिल की”-सोहेला अब्दुलाली


तीन साल पहले मेरा गैंगरेप हुआ था, उस वक्त मैं 17 साल की थी. मेरा नाम और मेरी तसवीर इस आलेख के साथ प्रकाशित हुए हैं. 1983 में मानुशी पत्रिका में. मैं बंबई में पैदा हुई और आजकल यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं. मैं बलात्कार पर शोधपत्र लिख रही हूं और दो हफ्ते पहले शोध करने घर आयी हूं. हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है.

मैंने महसूस किया है कि कई महिलाएं इस ग्रंथि के कारण चुप्पी साध लेती हैं, मगर अपने मौन के कारण उन्हें अपार वेदना का सामना करना पड़ता है. पुरुष पीड़ितों को कई वजहों से दोषी ठोहराते हैं और हैरत की बात तो यह है कि कई दफा महिलाएं भी पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं, संभवतः आंतरिक पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण, संभवतः खुद को ऐसी भीषण संभावनाओं से बचाये रखने के लिए.

यह घटना जुलाई की एक गर्म शाम की घटी. उस साल महिलाओं का समूह रेप के खिलाफ कानून में संशोधन की मांग कर रहा था. मैं अपने दोस्त राशिद के साथ थी. हम लोग घूमने निकले थे और बंबई की उपनगरी चेंबूर स्थित अपने घर से करीब डेढ़ मील दूर एक पहाड़ी के पीछे पहुंच गये थे और वहां बैठे थे. हम पर चार लोगों ने हमला किया, वे लोग दरांती से लैस थे. उन्होंने हमारे साथ मारपीट की, पहाड़ी पर चढ़ने के लिए मजबूर किया और वहां हमें दो घंटे तक बिठाये रखा. हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, और जैसे ही अंधेरा गहराया, हमें अलग कर दिया गया और अठ्ठाहस करते हुए उन्होंने राशिद को बंधक बनाकर मेरे साथ रेप किया. हममें से कोई प्रतिरोध करता तो दूसरे को वे चोट पहुंचाते. यह एक प्रभावी तरीका था.

वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे हमारी हत्या करें या नहीं. हमें अपने दम भर वह सब कुछ किया जिससे हम जिंदा बच जायें. मेरा जिंदा बचना था और वह हर चीज से अधिक महत्वपूर्ण था. मैं पहले उन लोगों का शारीरिक रूप से प्रतिरोध किया और जब मुझे गिरा दिया गया तो मैं शब्दों से प्रतिरोध करने लगी. गुस्से और चीखने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, मैं उन्हें प्रेम, करुणा और मानवता के लिए प्रेरित करने लगी, क्योंकि जिस तरह मैं इंसान थी, वे भी तो इंसान ही थे. इसके बाद उनका रवैया नर्म पड़ने लगा, खास तौर पर उनका जो उस वक्त मेरे साथ बलात्कार नहीं कर रहे थे. मैंने उनमें से एक से कहा कि अगर मुझे और राशिद को जिंदा छोड़ दिया गया तो मैं अगले दिन उनसे मिलने आउंगी. हालांकि इन शब्दों के बदले मुझे कहीं अधिक भुगतना पड़ा, मगर दो जिंदगियां दांव पर थीं. यही एकमात्र तरीका था कि मैं वहां से लौट पाती और अगली दफा खुद को रेप से बचा पाती.

जिसे बरसों की पीड़ा कहा जा सकता है उसे झेलने के बाद(मुझे लगता है मेरा 10 बार बलात्कार किया गया और कुछ देर बाद मैं यह समझना भूल गयी कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया. जाते वक्त उन लोगों ने हमें एक नैतिक उपदेश के साथ विदा किया कि मेरा एक लड़के के साथ इस तरह घूमना अनैतिक था. इस बात ने उन्हें सबसे अधिक नाराज किया था. उन्होंने ऐसा मेरे हित में ही किया था, वे मुझे एक पाठ पढ़ाना चाहते थे. यह बड़ी कट्टर किस्म की नैतिकता थी. उन्होंने हमें पहाड़ के नीचे छोड़ दिया और हम लड़खड़ाते हुए अंधेरी सड़क पर चलते रहते, एक-दूसरे पर टगते हुए और धीरे-धीरे चलते हुए. वे कुछ देर तक हमारा पीछा करते रहे, दरांती हिलाते हुए, और वह संभवतः सबसे बुरा पहलू था कि भागना इतना आसान था मगर मौत हमारे उपर ठहल रही थी. अंततः हम घर पहुंचे, टूटे हुए, क्षत-विक्षत, चूर-चूर. यह बच कर आने का एक अतुलनीय अनुभव था, अपने जीवन के लिए मोलभाव करना, हर शब्द तोलकर बोलना क्योंकि हम उन्हें नाराज करने की कीमत जानते थे, दरांती का वार कभी भी हमारे जीवन को समाप्त कर सकती थी. हमारी हड्डियों और हमारी आंखों में राहत दौड़ रही थी और हम ऐतिहासिक विलाप के साथ ढेर हो गये.

मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं इस बात को किसी और से नहीं बताउंगी, मगर घर पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपने पिता से कहा कि वे पुलिस को बुलाएं. वे इस बात को सुनकर चिंतित हो गये. मैं परेशान थी कि किसी और को उस अनुभव से नहीं गुजरना पड़े जिससे मुझे गुजरना पड़ा था. पुलिस असंवेदनशील थी, घृणित भी और वह किसी तरह मुझे दोषी साबित करने पर तुली थी. जब मैंने कहा कि मेरे साथ क्या हुआ, तो मैंने सीधे-सीधे कह डाला और इस बात को उन्होंने मुद्दा बना लिया कि अपने साथ हुए इस हादसे को बताने में मैं शर्मा नहीं रही थी. जब उन्होंने कहा कि इस बात का प्रचार हो जायेगा तो मैंने कहा, कोई बात नहीं. मैं इमानदारी से कभी यह सोच नहीं सकी थी कि मुझे या राशिद को दोषी माना जायेगा. जब उन्होंने कहा कि मुझे मेरी सुरक्षा किशोर रिमांड होम भेजा जायेगा. मुझे बलात्कारियों और दलालों के बीच रहना होगा ताकि मुझ पर हमला करने वालों को न्याय के सामने लाया जा सके.

बहुत जल्द मैंने समझ लिया कि इस कानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए न्याय मुमकिन नहीं है. जब उन्होंने पूछा कि हम पहाड़ी के पीछे क्या कर रहे थे तो मैं क्रुद्ध हो गयी. जब उन्होंने राशिद से पूछा कि वह क्यों निष्क्रिय हो गया, तो मैं चीख पड़ी. क्या वे यह नहीं समझते थे कि राशिद का प्रतिरोध मेरे लिए और पीड़ा का कारण बन सकता था. वे ऐसे सवाल क्यों पूछते थे कि मैंने कैसे कपड़े पहने थे, राशिद के शरीर पर कोई चोट का निशान क्यों नहीं है (पेट पर लगातार हमले के कारण उसे इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी), मैं दुख और निराशा में डूबने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें घर से बाहर भगा दिया यह कहते हुए कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं. यह वह सहायता थी जो मुझे पुलिस से मिली. पुलिस ने बयान दर्ज किया कि हम टहलने गये थे और लौटते वक्त देर हो गयी.

उस बात के तीन साल हो गये हैं, मगर ऐसा एक दिन भी नहीं बीता जब मुझे इस बात ने परेशान नहीं किया कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ. असुरक्षा, भय, गुस्सा, निस्सहायपन- मैं उन सब से लड़ती रही. कई दफा, जब मैं सड़क पर चलती थी और अपने पीछे कोई पदचाप सुनायी पड़ती तो मैं पसीने-पसीने होकर पीछे देखती और एक चीख मेरे होठों पर आकर ठहर जाती. मैं दोस्ताना स्पर्श से परेशान हो जाया करती, मैं कस कर बंधे स्कार्फ को बर्दास्त नहीं कर पाती, ऐसा लगता कि मेरे गले को हाथों ने दबा रखा है. मैं पुरुषों की आंखों में एक खास भाव से परेशान हो जाती- और ऐसे भाव अक्सर नजर आ जाते.

इसके बावजूद कई दफा मैं सोचती कि मैं अब मजूबत इंसान हूं. मैं अपने जीवन की सराहना पहले से अधिक करती. हर दिन एक उपहार था. मैंने अपने जीवन के लिए संघर्ष किया था और मैं जीती थी. कोई भी नकारात्मक भाव मुझे यह सोचने से रोकती कि यह सकारात्मक है.

मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती. ऐसा करना सबसे आसान था, और कई पुरुष ऐसे विभिन्न किस्म के दबाव के शिकार थे. मैं जिससे नफरत करती वह पितृसत्ता थी और उस झूठ की विभिन्न परतों से जो कहती कि पुरुष महिलाओं से बेहतर होते हैं, पुरुषों के पास अधिकार हैं जो महिलाओं के पास नहीं, पुरुष हमारे अधिकार संपन्न विजेता हैं. मेरी नारीवादी मित्र सोचतीं कि मैं महिलाओं के मसले पर इसलिए चिंतित हूं क्योंकि मेरा रेप हुआ है. मगर ऐसा नहीं है. रेप उन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसकी वजह से मैं नारीवादी हूं. रेप को किसी खाने में क्यों डाला जाये? ऐसा क्यों सोचा जाये कि रेप ही अकेला अवांछित संभोग है? क्या हर रोज गलियों में गुजरते वक्त हमारा रेप नहीं होता? क्या हमारा रेप तब नहीं होता जब हमें यौन वस्तु के तौर पर देखा जाता है, हमारे अधिकारों से इनकार कर दिया जाता है, कई तरीकों से दबाया जाता है? महिलाओं के दमन को किसी एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए, वर्ग विश्लेषम आवश्यक है, मगर क्यों बहुत सारे बलात्कार अपने ही वर्ग में किये जाते हैं.

जब तक महिलाएं विभिन्न तरीकों से दमित की जाती हैं. सभी महिलाएं लगातार बलात्कार के खतरे में हैं. हमें रेप को पेचीदा बनाने से रोकना पड़ेगा. हमें समझना पड़ेगा कि यह हमारे चारो तरफ अस्तित्व में है, और इसके विभिन्न स्वरूप हैं. हमें इसे गुप्त तौर पर दफन करना बंद कर देना होगा और इसे अपराध के एक रूप के तौर पर देखना होगा- इसे हिंसात्मक अपराध मानना होगा और बलात्कारी को अपराधी के तौर पर देखना होगा. मैं उत्साहपूर्वक जीवन जी रही हूं. बलात्कार का शिकार होना बहुत खौफनाक है, मगर जिंदा रहना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. मगर जब एक औरत को इसे महसूस करने से रोका जाता है, इसे तो हमारे तंत्र की गड़बड़ी माना जाना चाहिये. जब कोई बेवकूफ बनकर जिंदगी के एवज में खुद पर हमले को झेल लेती है तो किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि वह स्वेच्छा से मार खाना चाहती थी. बलात्कार के मामले में एक औरत से पूछा जाता है कि उसने ऐसा क्यों होने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, कहीं उसने इसका मजा तो नहीं लिया.

रेप किसी खास समूह की औरतों के साथ नहीं होता और न ही रेपिस्ट एक खास तरह के पुरुष होते हैं. रेपिस्ट एक क्रूर पागल भी हो सकता है और पड़ोस में रहने वाला लड़का भी या एक दोस्ताना अंकल भी. हमें अब रेप को किसी अन्य महिला की समस्या के तौर पर देखना बंद करना होगा. इसे हमें सार्वभौमिक तरीके से देखना होगा और एक बेहतर समझ की तरफ बढ़ना होगा. जब तक रिश्तों का आधार शक्तियां होंगी, जब तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता रहेगा, हम लगातार अपनी इज्जत गंवाने के खतरे में रहेंगे. मैं बचकर निकली हूं. मैं रेप किये जाने के लिए नहीं कहती और न ही मैंने इसका मजा लिया. यह एक सबसे बुरा किस्म का टार्चर है. मगर यह महिलाओं की गलती नहीं है.
आज सोहेला लिखती हैं, पढ़ती हैं और घूमती हैं. उसके दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. द मैडवुमन ऑफ जोगर एंड इयर ऑफ टाइगर, बच्चों की तीन किताबें, और कई छोटी कहानियां, लेख, खबरें, ब्लाग, कॉलम, मैनुअल आदि वे लिख चुकी हैं. उनके लिखित सामग्रियों को उनकी साइट www.sohailaink.com पर देखा जा सकता है.

पुष्यमित्र वरिष्ठ पत्रकार हैं। 
अभी रांची से प्रकाशित "पंचायतनामा" में कार्यरत हैं।
इनसे संपर्क का पता pushymitr@gmail.com है

(एक स्पष्टीकरण- मूलतः कन्फ्यूशियस की महिलाओं के प्रति समझदारी बहुत ही सामंती और पुरुषसत्तात्मक रही है. मूलतः उनका दर्शन महिला विरोधी दर्शन रहा है जिसने चीन में महिलाओं के प्रति शोषण व्यवस्था को हजारों सालों तक लगातार मजबूती दी. उनके दर्शन से हम इत्तेफाक नहीं रखते हैं. संभवतः उनकी इस समझदारी की वजह उनके दौर के चिंतन की दरिद्रता ही रही हो. लेकिन उपरोक्त आलेख में कन्फ्यूशियस के 'जिस' कोट को 'जिस' तरह लिया गया है, यहाँ प्रगतिशीलता का पुट है और यह असल में महिला मुक्ति की ओर संकेत करता है.  -मॉडरेटर)

(पत्रकार Praxis से साभार)

शिवसेना द्वारा पिटे कश्मीरी युवकों का दर्द : एक मुलाक़ात



सुनीता भास्कर
-सुनीता भास्कर


"...लेकिन हमें बार-बार टेरिरिस्ट कहा जाता है। हमारे हिंदु क्लासमेट हमारी फेसबुक वाल पर कई बार  टेरिरिस्ट टेरिरिस्ट लिख देते हैं। अफजल को फांसी होने पर हमारी कुलिग के फोन पर मेसेज आए कि बधाई हो  अफजल को फांसी हो गई। जफर ने बताया कि कालेज में  टीचर उनके प्रोजेक्ट में साइन भी नहीं करते हैं और कोई न कोई एरर बताकर फाइल वापस लौटा देते हैं। ..."

http://4.bp.blogspot.com/-VyqfBPDKOkA/UR0otrd-TcI/AAAAAAAAAMQ/BhUHPN5QHaQ/s1600/DSC_0008.JPGकुछ कश्मीरी युवकों से बातचीत करना जिदंगी का एक नया अनुभव रहा। हम कितनी बेफ्रिकी में जीते हैं, कितने बिंदास रहते हैं एक औरत का भय होने के सिवा और कोई भय नहीं। आखिर सौ करोड़ हिंदू जाति का एक हिस्सा जो हूं इसीलिए कभी महसूस ही न पायी कि अल्पसंख्यक होना क्या होता है उस पर भी मुस्लिम अल्पसंख्यक। 

आज जब उन युवकों से बातचीत के लिए उनके कमरे का एड्रस पूछा तो वह सहम गए। हम बुरा न मान जाएं शायद इसीलिए कहने लगे कि नहीं हम ही आ जाएंगे  मिलने बताईये कहां आएं। हमने पूछा कोई दिक्कत है कमरे में तो कहने लगे गर्ल्स के लिए नॉट अलाउड है। मैंने कहा हम तो एक जर्नलिस्ट की हैसियत से आ रहे हैं तो फिर उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें धमकाया है कि  कमरों में बैठे रहो बाहर निकलोगे तो खैर नहीं। और फिर आप लोग आओगे तो मकान मालिक को उनके घर में आना नागवार गुजरेगा। 

अब स्तिथियां कुछ समझ में आने लगी थी सो उन्हें उनके घर के पास के किसी पार्क में बुला लिया।  मैं अपने साथ एक सीनियर जर्नलिस्ट को लाई थी जिसने प्रामिस की थी  कि वह कश्मीरी स्टूडेंस की कंडीशंस  पर स्टोरी करेगी और उसके लिए अपने संपादक को भी मनवा लेगी। अपने अखबार की कश्मीरी स्टूडेंट्स के खिलाफ  विशेष पैकेजिंग देखकर इतना तो भान हो गया था कि स्टोरी छपना तो दूर आईडिया देने में भी लाइन हाजिर होना पड़ेगा।

कुछ देर इंतजार के बाद दूर से तीन नवयुवकों को आता देख हम एकाएक चौंक गए। हमने सोचा था कि हमारे वहां की तरह साधारण से लडक़े होंगे कुछ देर यहीं पार्क में बात कर चल लेगें। पर यह क्या यह तो विशुद्ध कश्मीरीयत भरे नौजवान, चेहरों पर डल झील सी निश्छलता, दूधिया  गुलाबी चेहरे,कुछ की हल्की तो कुछ की बड़ी दाड़ी और एक के सिर पर गोल सफेद (मुल्ला वाली) टोपी। हम एकाएक निर्णय तो नहीं ले पाए कि इन्हें यहां कालोनी के बीचों बीच के पार्क में बैठाना कितना मुनासिब होगा। लेकिन झट से उठकर खड़े हो गए। 

कालोनी वाले कोई झमेला करें इससे पहले हम उन्हें लौटा ले गए और आगे कोने में अपनी गाड़ी के पास खड़े खड़े लगभग चालीस मिनट  अनौपचारिक बातें की। इस बीच मध्यवर्गीय उस कालोनी के तथाकथित सभ्य व शिष्ट जन  हमें कश्मीरियों संग खड़े देख हार्न बजाते जरूर नजर आए। कुछ देर में दो स्कूटर सवार महिलाएं रोड़ी में स्लिप होकर नाली में गिर गई तो एकाएक वह कश्मीरी नौजवान दौड़ पड़े उन्हें उठाने.

बारामुल्ला डिस्ट्रिक के सोपेरा टाउन के इन नौजवानों में से एक मुह्म्मद जफर ने  बताया कि वह अभी अपने कालेज से लौटा है कल की घटना की अखबारी  प्रतिक्रिया के बाद वह क्लास पढऩे में सहज महसूस नहीं हो रहा था सभी लोग उन्हें रूड़ नजरों से देख रहे थे इसीलिए वह सिर्फ दो पीरियड पढक़र ही घर लौट आया। जफर का छोटा भाई मीर किसी कालेज में एडमिशन नहीं लिया है। जफर ने बताया कि  अब्बा व अम्मी ने कहा कि यहां से चला जा कहीं भी रह भाई के साथ पढ़ ले कुछ भी कर ले पर कश्मीर में मत रह। 

मीर ने कहा कि वह कुछ समय पहले ही यहां आया है सो वह अभी सोच समझ ही रहा है कि कहां व किस कोर्स में दाखिला ले। मीर ने कहा कि वह कल की घटना से काफी डरा हुआ है। उनके दो साथियों को शिव सेना के लोगों ने तिब्बती मार्केट के पास पकडक़र बहुत मारा है और जबरन घसीट कर पुलिस थाने ले गए। इसीलिए मीर को अब देहरादून में अच्छा नहीं लग रहा। तीसरे लडक़े आमिर नायक ने बताया कि देहरादून में लगभग दस हजार कश्मीरी हैं जिनमें स्टूडेंट और व्यापारी लोग हैं। 

उन्होंने बताया कि व्यापारी लोग ज्यादातर इललिटरेट हैं जो कि फेरी से साल बेचने का काम करते हैं। उसने बताया कि आज सुबह मेरठ का एक मुस्लिम दोस्त मिला उसने गले लगकर कहा कि कोई दिक्कत होगी तो बताना।  आमिर ने कहा कि काश यहां के सभी लोग हमारे साथ ऐसे ही पेश आते तो हम बहुत बेफ्रिकी से यहां रह सकते थे। लेकिन  हमें बार बार टेरिरिस्ट कहा जाता है। 

हमारे हिंदु क्लासमेट हमारी फेसबुक वाल पर कई बार  टेरिरिस्ट-टेरिरिस्ट लिख देते हैं। अफजल को फांसी होने पर हमारी कुलिग के फोन पर मेसेज आए कि बधाई हो  अफजल को फांसी हो गई। जफर ने बताया कि कालेज में  टीचर उनके प्रोजेक्ट में साइन भी नहीं करते हैं और कोई न कोई एरर बताकर फाइल वापस लौटा देते हैं। जफर ने बताया कि एक बार उसके सर पर पीछे चोट आ गई थी जहां पट्टी बांधी थी, लेकिन उस चोट के लिए उसे क्साल के कुलिगस ने बहुत टार्चर किया। क्साल की गर्ल्स कहती थी कि यह जफर के पीछे गोली लगी है इसीलिए घाव हुआ है। क्लास में कुलीग को देखकर लगता है कि हम चौतरफा टेरिस्ट होने की निगाहों से घिरे पड़े हैं। 

जफर ने बताया कि देहरादून में कमरा ढूंढने  के लिए अन्तत: उसे अपनी दाढ़ी काटनी पड़ी थी । वरना कोई भी कश्मीरियों को कमरा देने को तैयार ही नहीं होता। वह बताता है कि एक बार अनिल नाम के एक लडक़े से उसकी दोस्ती हो गई लेकिन दो तीन दिन  बाद जैसे ही उसे पता चला कि मैं कश्मीरी हूं तो उसने कहा कि उसे नहीं करनी किसी कश्मीरी से दोस्ती। कश्मीरी तो आंतकवादी होते हैं। और उसने मुझे अवाइड कर दिया। 

तीनों  लड़कों ने बताया कि वे कश्मीर में शांति बहाली के लिए मांग कर रहे थे। वहां पांच दिन से कफ्यू लगा है।  हमारे अब्बू लोग दूध लेने भी बाहर नहीं जा सकते। अगर यही स्थिति रही तो हमें  पैसों के भी लाले पड़ जाएंगे। हमारा खर्चा तो अब्बू ही कश्मीर से भेजते हैं। उन्होंने बताया कि उनके सोपेर टाउन की आबादी लगभग 48 हजार है। वहां की तीन पीढिय़ों ने किसी भी चुनाव में वोटिंग नहीं की है। वहां पर अभी लगभग तेरह लाख आर्मी लगी हुई है। जिन्होंने हमारी कितनी ही जमीन जब्त कर रखी है।  घर से निकलते हैं बाहर सीआरपीएफ व एसटीएफ का मन  होगा तो वह सीधे जाने देगा कोई सवाल नहीं करेगा और मूड बदल गया तो रोक लेगा फिर पूछताछ करेगा और अन्तत: छोडऩे के लिए 2 0 हजार की मांग करते हैं।  

अभी कश्मीर में इस कफ्यू के दौरान दस लोगों की मौत हो गई है जबकि मीडिया केवल एक की ही मौत दिखा रही है। उन्होंने बताया कि एक 11 साल के बच्चे को वहां की सीआरपीएफ ने अपनी बंदूक के बट से पीछे सर में मार दिया जिससे उसने दम तोड़ दिया और फिर उन्होंने उस बच्चे के शव को पानी में फेंक दिया। इसी तरह पुलिस  कभी हमारे घरों के सीसे तोड़ देती है तो कभी मस्जिद के सीसे तोड़ देती है । उसका सवाल है कि हमारी प्रार्थना की चीजें हमसे क्यों छीनी जा रही हैं। 

उन्होंने बताया कि वहां पर पुलिस दमन के लिए जिस टियर गैस का इस्तेमाल करती है वह हमारी आखों व शरीर के लिए भी हार्मफुल होता है।  अभी सोपोर में पांच लडक़े शहीद हो गए हैं। यहां पुलिस हमसे कहती है कि तुमने फेसबुक में आंतक फैला रखा है। उन्होंने बताया कि कश्मीर में लगभग दस फीसद सिक्ख व पांच से सात फीसद कश्मीरी पंडित हैं। वह उनके रक्षाबंधन होली समेत सभी त्यौहारों पर भागीदारी करते हैं। वहां पर स्पेशल आमर्ड फोर्सेस एक्ट का इतना खौफ है कि आठ साल के बच्चे का भी अपना आईडेंटीकार्ड होता है।  बिना पहचान पत्र के वह घर से बाहर  नहीं निकल सकता। रात के नौ बजे बाद बाहर नहीं निकलने दिया जाता।  

एक नौजवान व एक बुजुर्ग को पुलिस ने कश्ती में पत्थर भरकर डूबोकर मार दिया और कहते हैं कि कश्ती डूब गई थी। हम पाकिस्तान की मांग नहीं कर रहे। हम अपना स्वतंत्र कश्मीर चाहते हैं। अभी वहां पर पुलिस ना डाक्टरों को सख्त हिदायतें दी हैं कि अगर कोई भी अस्पताल में मरता है तो उसे मरा हुआ घोषित नहीं करेंगे और घर वालों से कहेंगे कि कौमा में है। उन्होंने यह भी बताया कि अब वहां पर सारे क्रिश्चयन मिशनरी स्कूल बारहवीं तक के खुलने लगे हैं। उन्होंने बताया कि वहां लोगों की आय का बड़ा साधन कृषि है इसीलिए पुलिस द्वारा भूमि कब्जाए जाने पर हजारों कश्मीरी बेरोजगार हो गए हैं। 

उन्होंने सीआरपीए व एसटीएफ के पुराने कारनामों के बारे में भी बताया कि एक व्यक्ति की पत्नी नीलोफर व उसकी बहन आसमा को  सेब के बगींचे  से लौटने के बाद  दोनों के साथ सामूहिक रेप कर उन्हें मार दिया गया। और एवज में उन पर कोई कार्रवाही भी नहीं की गई। अभी कफ्यू के दौरान एक गर्भवती महिला की एंबुलेंस को रोक दिया गया जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस वाले यह एक्ट गयारह साल के बच्चे पर भी लगा देते हैं उन्होंने जोर दे कर कहा कि वह पाकिस्तान की बात नहीं कर रहे हैं। वह अलग कश्मीर चाहते हैं।

सुनीता  पत्रकार हैं. 
अभी देहरादून में एक दैनिक अखबार में कार्यरत.
sunita.bhaskar.5@facebook.com पर इनसे संपर्क हो सकता है.

(पत्रकार Praxis से साभार)


गोरखालैंड की राजनीति और विमल गुरुंग के असमंजस


                                                                                                                                      -रमेश भगत

"...दरअसल विमल गुरूंग के इतना उत्तेजित होने का एक कारण यह भी है कि अलग गोरखालैंड राज्य के लिए लड़ने वाले अन्य संगठन विमल गुरूंग से नाराज हैं। उनकी नाराजगी का कारण जीटीए है। अन्य संगठनों का कहना है कि स्वायत्ता हमारा मकसद नहीं है, हमें अलग राज्य से कम कुछ नहीं चाहिए।..." 


 विमल गुरुंग
पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाकों में फिर से राजनीतिक हवाएं तेज होने लगी है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख और गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) के अध्यक्ष विमल गुरूंग ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग के लिए उग्र आंदोलन शुरू करने की धमकी दी है। विमल गुरूंग की धमकी के कई मायने हैं। दरअसल ममता बनर्जी चाहती है कि जिस तरह से गोरखाओं के लिए जीटीए बनाकर स्वायत्ता दी गई है उसी तरह बौद्धों और लेप्चाओं के लिए भी अलग से लेप्चा विकास परिषद् का गठन किया जाए। जीटीए के अध्यक्ष विमल गुरूंग, ममता बनर्जी की इस बात से नाराज है। विमल गुरूंग का कहना है कि "लेप्चा विकास परिषद् का गठन जीटीए के अधिन होना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी फूट डालो और राज करो की नीति के तहत गोरखाओं और लेप्चाओं को अलग करना चाहती है"। जीटीए का गठन त्रिस्तरीय समझौते के तहत हुआ है। इस समझौते में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार ने हस्ताक्षर किया है।

पिछले कुछ समय से विमल गुरूंग और ममता बनर्जी के रिश्ते सही चल रहे थे। लेकिन अब नहीं। दरअसल 29 जनवरी को दार्जिलिंग में हुए एक सरकारी कार्यक्रम में ममता बनर्जी और विमल गुरूंग साथ आए थे। उस कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने कहा कि दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का अभिन्न अंग है और इसे राज्य से अलग होने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को गोरखालैंड की मांग को छोड़कर विकास पर ध्यान देना चाहिए। ममता बनर्जी के इस भाषण के बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने ‘वी वांट गोरखालैंड’ के नारे लगाने लगे। जिससे आजिज़ आकर ममता बनर्जी ने कहा कि याद रखें मैं इस मामले को ‘रफ एंड टफ’ तरीके से भी निपटा सकती हूं। कुछ दिनों बाद विमल गुरूंग ने कहा कि ममता बनर्जी ने अपने नाम से उलट खुद को रफ एंड टफ बताकर अपने वास्तविक रूप का परिचय दिया है। ऐसी नीति चलती रही तो यह उनके राजनैतिक कैरियर का अंतिम चरण साबित होगा।

दरअसल विमल गुरूंग के इतना उत्तेजित होने का एक कारण यह भी है कि अलग गोरखालैंड राज्य के लिए लड़ने वाले अन्य संगठन विमल गुरूंग से नाराज हैं। उनकी नाराजगी का कारण जीटीए है। अन्य संगठनों का कहना है कि स्वायत्ता हमारा मकसद नहीं है, हमें अलग राज्य से कम कुछ नहीं चाहिए। साथ ही त्रिस्तरीय समझौते में सिर्फ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को बुलाने के लिए भी अन्य संगठनों ने राज्य व केंद्र सरकार की आलोचना की है। अन्य संगठनों के इस फैसले से गोरखाओं को लगने लगा है कि विमल गुरूंग अलग राज्य की मांग से हट रहा है। और सरकार के साथ नजदीकियां बढ़ाकर सिर्फ अपना फायदा देखने लगा है। इन बातों के दवाब में ही विमल गुरूंग ने अलग राज्य की मांग पर वापस लौटते हुए उग्र आंदोलन करने की धमकी दी है।

लेकिन विमल गुरूंग की इन धमकियों से ममता बनर्जी पर ज्यादा असर होने वाला नहीं है। क्योंकि ममता बनर्जी ने विमल गुरूंग को पहले ही कानूनी शिंकजे में कस रखा है। दरअसल मई 2010 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के तीन कार्यकर्ताओं ने अखिल भारतीय गोरखा लीग के नेता मदन तमांग की हत्या कर दी थी। अखिल भारतीय गोरखा लीग की अध्यक्षा भारती तमांग ने मदन तमांग की हत्या की सीबीआई जांच की मांग की है। सीबीआई जांच का डर ही विमल गूरूंग को कमजोर कर रहा है। जिसका राजनीतिक फायदा ममता बनर्जी उठा सकती है।

इस बात को ध्यान में रखकर विमल गुरूंग माकपा के करीब आने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन माकपा का संबंध विमल गुरूंग की अपेक्षा सुभाष घीषिंग से ज्यादा है। सुभाष घीषिंग गोरखालैंड नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नेता है लेकिन आम गोरखाओँ में उनका जनाधार काफी सिमट गया है। ऐसे में माकपा विमल गुरूंग के साथ क्या गुल खिलाती है यही पहाड़ में चल रही राजनीतिक हवाओँ का मिजाज बता सकता है।



रमेश पत्रकार हैं. अभी ईएमएमसी में कार्यरत. 
rameshbhagat11@gmail.com इनकी ई-मेल आईडी है.

(पत्रकार Praxis से साभार)


Sunday, 2 December 2012

पाश की एक कविता

हम लड़ेंगे साथी
उदास मौसम के ख़िलाफ़
हम लड़ेंगे साथी
गुलाम इच्छाओं के ख़िलाफ़
हम चुनेंगे साथी
ज़िन्दगी के टुकड़े
हम लड़ेंगे साथी
उदास मौसम के ख़िलाफ़

हथोड़ा अब भी चलता है
उदास निहाई पर
हल की लीकें अब भी बनती हैं
चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता
सवाल नाचता है
सवाल के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

क़त्ल हुए ज़ज्बात की कसम खाकर
बुझी हुई नज़रों की कसम खाकर
हाथों पर पड़ी गाठों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक कि
बीरू बकरिया जब तक
बकरियों की पेशाब पीता है
खिले हुए सरसों के फूलों को
बीजने वाले जब तक नहीं सूंघते

कि सूजी आँखों वाली गाँव की
अध्यापिका का पति जब तक
जंग से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने ही भाइयों का गला दबाने को विवस हैं
कि बाबू दफ्तरों के जब तक
रक्त से अक्षर लिखते हैं
हम लड़ेंगे
जब तक दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है

जब बन्दूक न हुई तो तलवार होगी
जब तलवार न हुई तो लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ लड़ने की ज़रुरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे कि
लड़ने के बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे कि
अभी तक लड़े क्योँ नहीं

हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जाने वालों की
याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी

Monday, 1 October 2012

चंडीगढ़ डायरी, दूसरी किस्त....!

अगली सुबह जब वो उठा तो उसे लगा जैसे सूरज आज जल्दी निकल आया हो, लेकिन घडी में समय बहुत ज्यादा हो गया था, करीब पौने दस। बरामदे पर पीली धूप थी, सितम्बर के महीने की हलकी-हलकी हवा से आस-पास के पेड़ों के पत्ते सरमरा रहे थे और आसमान एकदम साफ़ था। नीचे मकान मालिक का कुत्ता बड़ी जोरों से भोंक रहा था जैसे की कोई अनजान आदमी घर में घुस आया हो। उसका रूम मेट भी अपने काम में जा चुका था। वह कभी नौकरी नहीं करना चाहता था लेकिन चंडीगढ़ जैसे महेंगे शहर में बिना नौकरी के गुजरा भी संभव नहीं था, इसीलिए लेखन के छोटे-मोटे काम कर लिया करता था और एक लोकल अख़बार में नौकरी भी। लिखने का उसे बहुत शौक था इसलिए उसने अख़बार में नौकरी करनी सही समझी। आज तो उसे न्यूज़ पेपर पढने का भी समय नहीं था, ऑफिस के लिए लेट जो हो रहा था। उसने सोचा की चलो कुछ हेड लाइंस ही पढ़ ले। उसने सिगरेट का पाकिट उठाया और सिगरेट जलाई फिर डेस्क की तरफ गया, वहां डेस्क पर एक चिट चिपकी हुयी थी, जिस पर लिखा था कि "ब्रेकफास्ट रखा है खा लेना, मिलते हैं।" आशीष हमेशा से उसकी अनुपस्थिति में या उसके सोये होने पर डेस्क पर ऐसी चिट चिपकाकर ही कहीं जाता था, और चिट के आंखिरी में "मिलते है" हमेशा ही लिखा रहता था। उसे भी आशीष की ये आदत पसंद थी, शायद इसमें उसे अपनेपन से भी ज्यादा कुछ दीखता था, जिसे वो कभी भी शब्दों में परिभाषित नहीं कर सकता था। उसने किचेन में जाके देखा, कुछ ब्राउन ब्रेड, आमलेट और सांसेस रखे हुए थे।

         आज उसका दफ़्तर जाने का मन नहीं था, कल से एक घबराहट ने उसके अन्दर जगह बना की थी, वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था की ये विचित्र सी घबराहट क्या है? पर दफ्तर तो उसे जाना ही था। उसने एक सिगरेट जलाई, अपनी किताब और कुछ जरूरी सामान झोले में डाले और घर के दरवाजे बंद करके बाहर आ गया। मकान मालिक लोन में बैठा हुआ था। कुत्ता अभी भी भोंक रहा था, उसे देख कुत्ता दौड़ते हुए उसके पास चला आया और उसकी पैंट खींचने लगा। उसने कुत्ते के सर पर हाथ फ़ेरा और उसे हटाया। दफ्तर के लिए पहले ही देर हो चुकी थी। गेट से बहार आकर ऑटो लिया और सतारा (सेक्टर-17), जहाँ उसका ऑफिस था चलने को कहा।

"तुम आज फिर लेट हो गए?" उसके कलिग के मजाक के लहेजे में कहा।

वह हलके से मुस्कुराया और अपनी सीट पर बैठ गया।

"अम्बर क्या तुम्हें नहीं लगता, तुम अकेलेपन के शिकार होते जा रहे हो। तुम क्योँ अपने आप में खोये रहते हो? कोई परेशानी है तो बताओ" राकेश बोला।

" नहीं! ऐसी कोई बात नहीं है, बस आजकल कहीं भी मन नहीं लगता मुझे खुद भी पता नहीं है कि मेरे साथ ऐसा क्योँ हो रहा है?" उसने जवाब दिया।

उसे समझ नहीं आ रहा था की वह राकेश कैसे बताये कि उसके अन्दर क्या उथल-पुथल मची हुयी है, कोई भी शब्द उसके पास नहीं थे ये बताने को। शायद ये भी एक उलझन ही थी उसके लिए। उसे तो कभी यहाँ होना ही न था, उसे लड़ना था, शोषकों से, पूंजीवादियों से, उसने अपने लिए वह ख्वाब नहीं देखे थे जो वह कर रहा था। उसने मीडिया इसीलिए चुना था की वो आवाज उठा सके, गरीबों के हक में और पूंजीवादी हुक्मरानों के खिलाफ़। लेकिन जल्द ही उसे पता चल गया कि आज का मीडिया भी तो पूंजीवादी है, और उसे ऐसी कोई भी जगह नहीं दिखती थी जहाँ पूंजीवाद ने अपनी जडें न जमायीं हों।

जब भी हम कभी किसी चीज़ से भागने लगते हैं तो वो चीज़ अनजाने ही हमारे साथ चलने लगती है। हमारे मन-मस्तिस्क पर भी काबू कर लेती है, उससे बचने या दूर भागने के तरीके सोचते हुए हम कब उसकी ज़द में आ जाते हैं हमें पता नहीं चलता।

"तुम्हारी मर्ज़ी मत बताओ लेकिन इस तरह मत रहा करो। लोगों से मिलो, बात करो, अपने अन्दर के एकाकीपन को दूर करने की कोशिश करो। केवल अपने काम और निजी ज़िन्दगी तक ही सीमित मत रहो।" राकेश ने कहा।

"क्या तुम्हारे पास सिगरेट है? आज में अपना पाकिट घर पर ही भूल आया" उसने बात टालने के लिए कहा।

"तुम कभी नहीं सुधरोगे" राकेश ने हँसते हुए सिगरेट का पाकिट बढाया।

उसने सिगरेट जलाई और अपना काम करने लगा।

         शाम के करीब सवा छः बजे थे। वह दफ़्तर से बाहर आया। खुले आसमान की जगह हल्के-हल्के बादलों ने ले की थी, जो आसमान को अपने आगोश में लेने को आतुर दिखाई दे रहे थे। ढलती धूप कभी-कभी बादलों के बीच से निकल कर और वापस उसके आगोश में आकर लुक्का-छिप्पी खेल रही थी। मद्धिम हवा उसके कानों को छूकर ऐसे निकल रही थी जैसे रुई का फाहा उससे टकराकर निकल रहा हो।

        उसने सुखना का ऑटो लिया। ऑटो में बैठते ही उसे वही जानी पहचानी घबराहट ने फिर जकड लिया। वह सोच रहा था की आज उसे सुखना जाना चाहिए या नहीं। उसे लग रहा था कि छोटी-छोटी बातों में घबराने की उसकी आदत बन गयी है। क्योँ वह हर आम आदमी की तरह नहीं रह सकता? राकेश की बात उसे बिलकुल सही लगने लगी थी। वह वाकई एकाकीपन का शिकार को रहा था। लेकिन अब नहीं, वह अब ऐसे नहीं रहेगा। उसने मन ही मन सोचा।

        इन्ही ख्यालों में खोया था की उसे पता भी नहीं चला कि सुखना झील कब आई। ऑटो वाले को पैसे देकर वह झील की तरफ चले गया। झील का माहौल हमेशा की तरह खुशगवार था। वह जहाँ भीड़-भाड़ कम थी उस ओर चल पड़ा और पेड़ के नीचे की एक बेंच पर बैठ गया। अच्छी खासी भीड़ होने के बावजूद एक रहस्यमयी शांति उसके चरों और फैली हुई थी। झील की नैसर्गिता देखते ही बनती थी, झील में बतखें तैर रही थी और दूर बोटिंग करते लोग भी बतखों से ही प्रतीत होते थे। उसे लगता कि सुखना के हर एक चीज़ से उसका गहरा नाता है। कुछ देर बाद उसने अपनी किताब निकली और पढने लगा।

"हैलो अम्बर!" पीछे से आवाज आई।

"हैलो!" वह आवाज पहचान गया था। वह वर्तिका ही थी। हल्की सी घबराहट ने उसे फिर से घेर लिया।

"मैं आप ही का वेट कर रही थी, मैंने आपको आते हुए देख लिया था, हाथ भी हिलाया पर शायद आपने गौर नहीं किया" वर्तिका ने कहा।

"माफ़ कीजियेगा मैंने वाकई आपको नहीं देखा। कैसी हैं आप ?" वह बोला।

"एक दम बढ़िया" वर्तिका ने बेंच पर बैठते हुए कहा।

"आप वो दूर पहाड़ देख रहे हैं। मैं हमेशा से ही उनके बीच जाना चाहती हूँ, वहीँ रहना चाहती हूँ जिंदगी भर, इस शहरी भागमभाग से दूर शांति में।" वर्तिका ने दूर दीखते हिमांचल के पहाड़ों की ओर इशारा करते हुए कहा।

"वहां जाना किसको अच्छा नहीं लगता है?  दुनिया में कोई आदमी ऐसा भी होगा भला जो वहां नहीं जाना चाहेगा।" उसने उत्तर दिया।

उसके अन्दर एक टीस सी उठ गयी थी। वो भी तो पहाड़ से ही आया था यहाँ, हालातों से मजबूर होकर। जिस शहर की तलाश में वो निकला था ये वो शहर तो नहीं था, शायद दुनिया का कोई भी शहर वो शहर नहीं। और गाँव, गाँव तो हमेशा ही विकास की राह ताकते रह जायेंगे, मूलभूत सुविधायें हो न हो, मकान जरूर बनते जायेंगे। उसने मन ही मन सोचा।

"कहाँ खो गए आप?" वर्तिका ने कहा।

नहीं, कहीं नहीं,! वो जैसे गहरी नींद से जागा।

"तो आप वहां चली क्यों नहीं जाती?" उसने पुछा।

"काश जा पाती तो यहाँ कभी भी लौट कर नहीं आती, कभी भी नहीं, लेकिन परिस्थितियों के आगे हम सब मजबूर हो जाते हैं।" वर्तिका ने कहा।

"हां, हम सब परिस्थितियों के आगे ही तो मजबूर हैं।" उसने कहा। उसकी घबराहट अब ख़त्म हो चुकी थी।

"आप करते क्या हैं?" वर्तिका ने पुछा।

"यहीं के एक लोकल न्यूज़ पेपर में काम करता हूँ।" उसने कहा। "और आप?" उसने पुछा।

"मैं थिएटर करती हूँ।" वर्तिका ने उत्तर दिया।

"अरे वाह! आपसे अब मिलते रहना पड़ेगा। मुझे थिएटर बहुत पसंद है।" उसकी आँखों में ख़ुशी का भाव दौड़ आया। उसे वाकई थिएटर पसंद था। दिल्ली में वह थिएटर जाते रहता था। उसके कुछ दोस्त भी थिएटर करते थे।

"तो आइये कभी हमारा शो देखने।" वर्तिका खुश होकर कहा।

"ज़रूर, आप बुलायेंगी तो क्यों नहीं।" उसने कहा।

"तो आइये हमारे शो में, जल्दी ही होगा शायद अगले महीने के पहले सप्ताह पर ही, 'असग़र वज़ाहत का 'जिस लाहोर नि वेख्या ओ जन्म्या ई  नि'।" वर्तिका ने कहा।

वर्तिका की आँखों में उसे एक नयी चमक दिखाई दी।

"जी ज़रूर आऊंगा, ये मेरा पसंदीदा नाटकों में से एक है" उसने कहा।

"अच्छा मुझे अब चलना चाहिए।"  वर्तिका ने कहा।

"ओके! फिर मुलाकात होगी।" उसने जवाब दिया।

        स्ट्रीट लाइट जल उठी थी, आसमान भी बिलकुल साफ़ हो चुका था। शाम की हल्की-हल्की रौशनी रात के अँधेरे में बदल गयी थी। स्ट्रीट लाइट के मद्दिम प्रकाश में झील की तरंगों का सोंदर्य देखते ही बन रहा था, झील में तैरती नांव किनारे आ चुकी थी। उसने पाकिट से सिगरेट निकाल कर जलाई, और एक लम्बा सा कश लगाया। आज उसे घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। कुछ हल्कापन सा महसूस हुआ उसे, जैसे कोई बंदिश टूट गयी हो। एक नए एहसास ने उसके अंदर जन्म लिया था।


                                                                                                   क्रमश:--------