Thursday, 21 February 2013

क्या कश्मीर की आज़ादी ही हल है?

-डॉ. मोहन आर्या

अन्तराष्ट्रीय कूटनीति के सबसे जटिलतम भूगोलों में से एक कश्मीर, का राजनीतिक संकट फिर चर्चा के केन्द्र में आ गया है. अबकी बार इस चर्चा की वजह बनी है कश्मीर के एक नागरिक को भारतीय चुनावी राजनीति की उठा-पटक के लिए 'जनमानस की सामूहिक अंतरात्मा' की दुहाई देकर फांसी के फंदे पर लटका दिया जाना. अफजल गुरू की फांसी के बाद अखबारों, चैनलों, इंटरनेट और फोन आदि पर रोक लगाते हुये भारतीय राज्य ने समूचे कश्मीर को भयंकर अन्धकार के कर्फ्यू में धकेल दिया. यह बताता है कि कश्मीर भारतीय लोकतंत्र के कवरेज एरिया से बाहर है. ऐसे में कश्मीर की आवाम की तरफ से उठती आज़ादी की मांग दुनिया भर के अमनपसंद लोगों को सहमत करती है. लेकिन यह बात इतनी ही सरल भी नहीं है. इसके पक्ष और विपक्ष में प्रगतिशील हलके में पर्याप्त बहस भी है. praxis में हम इस बहस को खोलना चाह रहे हैं. इसे हमने 'कश्मीर बहस' नाम दिया है. इसके लिए praxis के पुराने पन्नों को पलट कर एक आलेख फिर आपके सामने रख रहे हैं. जो इस विषय के विस्तार में जाकर इससे जुड़े ज़टिल प्रश्नों को सामने रखता है. उम्मींद है कश्मीर और अन्य राष्ट्रीयताओं के सवाल पर एक स्वस्थ बहस इस आलेख की बुनियाद में खुल सकेगी. इस क्रम में हमारी कोशिश है कि प्रतिक्रियाओं और आलेखों से हम इसे आगे बढ़ाएं. praxis के पाठक ही इसके लेखक भी हैं. आपको ही टिप्पणियों और प्रतिक्रिया आलेखों से इसे आगे बढ़ाना है...

-मॉडरेटर

कश्मीर बहस - 1

-डॉ. मोहन आर्या

'कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा।'
                                                                                         -अरुंधती राय
'राष्ट्र एक ऐसा जन समुदाय होता है जिसका गठन ऐतिहासिक प्रक्रिया में होता है। सामान्य भाषा भौगोलिक क्षेत्र आर्थिक जीवन और मनोवैज्ञानिक संरचना उसकी सामान्य संस्कृति के आवयविक तत्व होते हैं'   
-जोसेफ स्टालिन
'आखिर विभाजन है क्या? भारत का विभाजन अपनी जातियों मध्यवर्ग और जनता के बीच संपर्क की कमी की स्थिति का एक तरह से कानूनी दस्तावेज है।'
-डा0 राम मनोहर लोहिया
'इन मूलभूत सिद्धांतों की सच्चाई को समय ने कम करने के स्थान पर सुदृढ़ ही किया है- समाज का अनिवार्यतः संघीय चरित्र, प्रसव पीड़ा से गुजर रही विष्व अर्थव्यवस्था के साथ संप्रभु राज्यों की संगति न बैठना, उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत् स्वामित्व के अधिकारों और लोकतांत्रिक विचारों के बीच विरोध, समता विहीन स्वतंत्रता के निरर्थक होने की अवधारणा, मात्र औपचारिक होने के कारण कानून को वैध मानने से इनकार किसी समाज में गंभीर आर्थिक स्थितियों में शासन का प्रभाव धनी लोगों के पक्ष में ही रहना चाहे वह सार्वजनिक मताधिकार पर ही आधारित क्यों न हो।'  
-हेराल्ड जे0 लास्की

जहां तक इस लेख के प्रविषय की बात है तो उपर्युक्त चार टिप्पणियां, यदि हम ढेर सारी रियायतें चाहें तो मुख्यतः दो अलग-अलग चिंतनधाराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। अरुंधती द्वारा उठाए गए मुद्दे का हल इस मुद्दे की प्रकृति की तरह सामयिक नहीं हो सकता। यदि कोई तात्कालिक उपाय निकल भी आए तो आत्मनिर्णय जो किसी भी तरह की अस्मिता उत्पीड़न और अलगाव से वैधता ग्रहण करके संप्रभुता में बदला है ऐतिहासिक रूप से समग्रतया मानवता के लिए हानिकारक तो रहा ही है साथ ही उन मानव समूहों के लिए भी कुछ खास लाभदायक नहीं रहा है जिन्होंने इसकी मांग की थी। अपने आप को विश्व नागरिक मानने वाली अरुंधती और उनके जैसे दूसरे मानवाधिकारवादी इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं।
तथ्यात्मक रूप से अरुंधती की बात एकदम सही है परंतु तथ्य तो यह भी है कि उत्तराखंड राज्य भी भारतीय राष्ट्रराज्य जैसी किसी अवधारणा से हमशा ही ताल्लुक नहीं रखता था। इसे स्थानीय राज्यवंशों से पहले गोरखाओं ने जीता फिर गोरखाओं से अंग्रेजों ने। यही बात कई अन्य राज्यों के लिए भी कही जा सकती है। तथ्य जो कुछ कहते हैं वह सटीक तो हो सकता है परंतु समीचीन भी हो आवश्यक  नहीं।

अब प्रश्न यह है कि यह तथ्य कश्मीर के लिए ही इतना प्रासंगिक नजर क्यों आता है। और इस तथ्य पर आधारित किसी विचार प्रणाली के कार्यान्वयन के स्वाभाविक और तार्किक परिणाम क्या हो सकते हैं। कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा यह बात कश्मीरियों  के ‘आजादी’ के संघर्ष को वैधता प्रदान करती है। इस ‘आजादी’ की लड़ाई के मूलआधार क्या हो सकते हैं?
· भारतीय राज्य द्वारा 'एएफएसपीए' द्वारा उत्पीड़न। 
· कश्मीरी जनता का अन्य भारतीयों से अलगाव। 
· विलय के समय की स्थितियों व शर्तों से गैर इत्तेफाक। 
· कश्मीरी जनता का एक जमात, जो मुख्य रूप से इस्लामी जमात ही है 'के रूप में पृथक राष्ट्रीयता का दावा। 
· पृथक राष्ट्रीयता के आधार पर आत्मनिर्णय की मांग। 
· आत्मनिर्णय से संप्रभु राष्ट्र की स्थापना का लक्ष्य।

अगर बात यहीं पर समाप्त हो जाए तो शायद विवेकशील और निष्पक्ष मनुष्य संतुष्ट भी हो जाएं। परंतु इससे आगे भी कुछ होगा।
संप्रभु राष्ट्र की स्थापना का मतलब है एक और नई सीमा, नए वीजा कानून, नई सेना, नई सीक्रेट सर्विस, नया अविश्वास और हो सकता है नया परमाणु बम! विश्व का और अधिक असुरक्षित होना और हथियारों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का और अधिक मुनाफा। जनता की वास्तविक आवश्यकताओं के बजाय राज्य सेना बार्डर बम कूटनीति पर अधिक ध्यान देता है क्योंकि बहुराज्यीय विश्व में किसी भी राष्ट्र-राज्य का यही चरित्र होना है।
कश्मीर या देश के अन्य हिस्सों में भी पृथकतावादी आंदोलनों की समस्या वास्तव में राज्य की आंतरिक संप्रभुता के केंद्रीकरण की समस्या है। और इनका समाधान नए आंतरिक संप्रभुओं को पैदा करके नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश शासन के समय मुस्लिम जनता के सांस्कृतिक अलगाव हिन्दुओं द्वारा उत्पीड़न और चुनावी लोकतंत्र में हमेशा के लिए मुस्लिमों के अल्पसंख्यक रह जाने के भय के आधार पर पृथक मुस्लिम राष्ट्रराज्य का जन्म हुआ। जो कि वास्तव में संप्रभुता के केंद्रीकरण की समस्या का तदर्थ उपाय ही साबित हुआ है। क्योंकि भाषाई व सांस्कृतिक आधार पर राष्ट्रीयता और पंजाबी लोगों के बांग्ला लोगों पर वर्चस्व के विरुद्ध नए संप्रभु बांग्लादेश का जन्म हुआ। बलूच संप्रभुता के लिए संघर्ष अभी जारी ही है। इस विखंडन और विभाजन की क्या कोई सीमा भी है? 
कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि ब्रिटिश शासित भारतीय उपमहाद्वीप में तीन संप्रभुताओं के पैदा हो जाने से यहां की जनता की समस्याओं को सुलझा लिया गया है। वास्तव में तो जनता को अनचाहे युद्धों धार्मिक उन्माद उग्रराष्ट्रवाद और सांप्रदायिक दंगों का सबसे अधिक शिकार होना पड़ा है। सबसे गंभीर बात यह है कि एक कड़वाहट मौजूद हो गई है जिसका इतिहास पुराना नहीं है और जिसकी उम्र अभी बहुत लंबी होगी। 
पृथक कश्मीर की अवधारणा में जो सबसे खतरनाक बात है, वह है राष्ट्रीयता को आधार बनाए जाने वाले सिद्धांत। यह आत्मनिर्णय वहां की बहुसंख्यक मुस्लिम जनता का आत्मनिर्णय है। धार्मिक आधार पर पृथक राष्ट्रीयता को जायज ठहराना कहां तक उचित है। चाहे कितने भी लोकतांत्रिक दावे किए जाएं धार्मिक अस्मिता के आधार पर वैधता ग्रहण करने वाली राष्ट्रीयता लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध ही खड़ी नजर आती है। 
याद कीजिए 'कायदे आजम' मुहम्मद अली जिन्नाह का पाकिस्तान की स्थापना पर दिया गया भाषण जिसमें उन्होंने जोर दिया ‘अब जब पाकिस्तान बन ही गया है तो यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनेगा।’ जिन्नाह गलत साबित हुए और कश्मीर के मामले में तो जिन्नाह जैसा कोई धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विशवास रखने वाला नेतृत्व कम से कम हुर्रियत कांफ्रेस के पास तो नजर नहीं आता। जिन्नाह, गिलानी और उनके जैसे नेताओं से साठ सत्तर साल पहले हुए हैं। परंतु विचारों के लिहाज से कहीं अधिक आधुनिक और प्रगतिशील  हैं। 
जिन्नाह के बावजूद पाकिस्तान की परिणति को देखते हुए जिन्नाह जैसों की गैरमौजूदगी में कश्मीर की परिणति की कल्पना की जा सकती है। क्या पृथक कश्मीर  इतना लोकतांत्रिक भी होगा जितना वर्तमान में भारत है? अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस्लामिक कट्टरवाद के उभार के इस दौर में संदेह होता है। विवेकशील को संदेह का अधिकार होना ही चाहिए।
तो धार्मिक आधार पर आत्मनिर्णय तो तर्कसंगत नहीं लगता। अब बात करें उत्पीड़न की। 'एएफएसपीए' निसंदेह एक उत्पीड़क अधिनियम है। भारतीय राज्य को जितना लोकतांत्रिक (कम से कम पारिभाषिक रूप से) बताया जाता है यह अधिनियम उससे बिल्कुल भी संगति नहीं रखता। 'एएफएसपीए'  और इसके जैसे तमाम कानून सच्चे लोकतंत्र में मौजूद नहीं होने चाहिए। इनकी मौजूदगी भारतीय राज्य के लोकतांत्रिक होने पर प्रश्नचिन्ह लगाती है तथा बताती है कि हमारा लोकतंत्र वास्तव में अधूरा है। 
सशस्त्र सेनाओं को नागरिकों की हत्याओं की खुली छूट नहीं दी जा सकती। उत्पीड़न से अलगाव पैदा होना स्वाभाविक ही है। परन्तु  प्रश्न इस अधूरे लोकतंत्र को पूरा बनाने का है। पृथक संप्रभु उत्पीड़न के खिलाफ कारगार उपाय नहीं होगा। क्योंकि नया संप्रभु भी किसी न किसी आधार पर उत्पीड़क ही हो जाएगा क्योंकि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में संप्रभुता जिस रूप में है उसे तो उत्पीड़क ही होना है। लड़ाई संप्रभुता के इस स्वरूप को बदलने के लिए होनी चाहिए न कि उसी ढांचे के नए संप्रभुओं को पैदा करने की।
साथ ही यदि अलगाव और उत्पीड़न के आधार पर पृथक संप्रभुत्व को वैधता प्रदान की जाय तो भारत के भीतर पृथक राष्ट्रीयता का दावा करने का पहला अधिकार दलितों का है। याद कीजिए डा0 अम्बेडकर का भाषण जिसमें उन्होंने धर्मान्तरण की अपर्याप्तता एवं देषांतरण के विकल्प पर बात की है। कम्यूनल अवार्ड 1932 के दलितों के पृथक निर्वाचन संघ का तार्किक परिणाम पृथक राष्ट्रीयता ही हो सकता था। परंतु तत्कालीन दलित जनता का इस तरह का राजनीतिकरण हुआ ही नहीं था। ना ही दलित नेतृत्व मुस्लिम नेतृत्व की तरह संपत्तिशाली था और उतने सशक्त दबाव गुट के रूप में काम नहीं कर सकता था। दलित पृथक राष्ट्र की ओर नहीं बढ़े इसके जो भी कारण रहे हों परन्तु यह ऐतिहासिक रूप से समग्रतया अच्छा ही है। क्योंकि पृथक दलित संप्रभु के बीच से अन्य आधारों पर पृथक राष्ट्रीयताओं की मांग नहीं उठती ऐसा सोचना इतिहास को नकारना ही होगा।
यह तो रही उत्पीड़न और अलगाव की बात। अब ‘जोसेफ स्टालिन’ की राष्ट्र की परिभाषा की ओर ध्यान दें तो मार्क्सवादियों को सबसे अधिक प्रिय यह परिभाषा कई मायनों में अपर्याप्त है। स्वयं स्टालिन ने अपने वचनों का मोल नहीं रखा था। कौन कह सकता है कि चेचन विद्रोहियों की सामान्य संस्कृति, भाषा, भौगोलिक क्षेत्र, मनोवैज्ञानिक संरचना नहीं है। तो राष्ट्र बनने की इनकी प्रक्रिया की ऐतिहासिकता को किसने तोड़ा था? स्वाभाविक उत्तर है ‘स्टालिन’ ने। 
द्वितीय विश्वयुद्ध में चेचन ‘विश्वासघात’ का बदला लेने के लिए स्टालिन ने चेचन्या के साथ जो किया वह सब करते हुए वे एक निष्ठ ुर तानाशाह अतिकेंद्रीयता में विश्वास करने वाली संप्रभुता के प्रवक्ता नजर आते हैं। यदि वह राष्ट्र की अपनी परिभाषा पर कुछ भी विश्वास करते तो चेचन्या को आत्मनिर्णय का अधिकार भले ही न देते लेकिन चेचन राष्ट्रीयता की बात करने वालों को साइबेरिया में निष्कासित तो ना ही करते। परन्तु यह बात ध्यान रखने की है कि पृथक राष्ट्र के संघर्ष में चेचन द्वारा अंजाम दी गई बेसलान स्कूल के नृशंश हत्याकांड को किसी भी तरह से औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता। 
यह इस बात का सबूत है कि एक पक्षीय स्वार्थी हित अच्छे और बुरे के बीच में फर्क करने में असफल होते हैं यह बात स्टालिन और चेचन दोनों पर लागू होती है। यहां भी मूल समस्या तो संप्रभुता के केंद्रीकरण की समस्या ही थी। कम्युनिस्ट चीन ने तिब्बत की राष्ट्रीयता के साथ जो किया है चह राष्ट्र की मार्क्सवादी परिभाषा से मेल नहीं खाता। 
भारत के विभाजन पर मार्क्सवादियों के रुख को देखकर लोहिया ने कहा था ‘अपने स्वभाव से कम्युनिस्ट दांव पेंच का स्वरूप ही ऐसा है..... जब यह शक्तिहीन रहता है अपने शत्रु को कमजोर करने के लिए यह सशक्त राष्ट्रीयता का सहारा लेता है। जब यह राष्ट्रीयता का प्रतिनिधित्व करता है तब वह पृथकवादी नहीं रहता। साम्यवाद कोरिया और वियतनाम में एकतावादी है और जर्मनी में पृथकतावादी।...’
अब तक के अनुभवों से ऐसा लगता है कि जब साम्यवादी कमजोर होते हैं तो उपराष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय का समर्थन करते हैं और जब सत्ता में होते हैं तो उनका दमन करते हैं। यूएसएसआर की इकाई सदस्यों के पृथक होने के औपचारिक अधिकार का क्रियान्वयन कितना अव्यावहारिक था अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के अध्येता अच्छी तरह समझते हैं। जबकि रणनीतिक तौर पर भी बहुराष्ट्रीय राज्य के भीतर मार्क्सवादियों का आंदोलन उन राष्ट्रराज्यों की तुलना में अधिक आसान होना चाहिए जिन्होंने धर्म भाषा या जातीय उत्पीड़न के आधार पर आत्मनिर्णय प्राप्त किया हो। क्योंकि ऐसे राष्ट्रराज्यों में शासकवर्ग जनता को धर्म, भाषा या जातीय राष्ट्रवाद के आधार पर अधिक भुलावे में रखता है। क्या कारण है कि पाकिस्तान में मार्क्सवादी, भारत के मार्क्सवादियों की तुलना में कमजोर हैं। तो कुलमिलाकर ऐसा लगता है कि राष्ट्र को लेकर मार्क्सवादी अवधारणा का केवल अकादमिक महत्व ही है।
अब बढ़ें लोहिया की ओर। लोहिया की यह बात कि भारत का विभाजन, शासक व शासित के बीच जनता, मध्यवर्ग और विभिन्न जातियों के बीच संपर्क के अभाव का कानूनी दस्तावेज है। उपराष्ट्रीयताओं के उद्भव और उनके आत्मनिर्णय में परिणत होने की प्रक्रिया का यह उत्कृष्ट विश्लेषण लगता है। यद्यपि यह सामान्यीकरण प्रतीत होता है परन्तु वास्तविकता तो यही है कि संप्रभु और जनता के बीच खाई और जनता के विभिन्न हिस्सों के बीच संवादहीनता से ही अलगाव पैदा होता है। उस पर संप्रभु की यह अकड़ कि वह संप्रभुता को अपने ही पास रखेगा (भले ही संप्रभुता जनता में केंद्रित मानी जाय परंतु वास्तव में एक वर्ग विभाजित समाज में वह कुछ खास लोगों के पास ही रहती है।) खास सामाजिक रूप से वर्चस्वशाली तबकों की स्थिति जब निर्णायक की होती है तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। 
एक निश्चित सीमा के बाद इसे संरक्षणात्मक भेदभाव जैसे उपाय नहीं संभाल सकते। रंगनाथ मिश्र कमेटी और सच्चर आयोग बहुत देरी से की गई पहलें हैं। और इनकी सिफारिशें भी अभी क्रियान्वित नहीं की गई हैं। हालांकि इस तरह के उपायों से प्रारंभ (1950-60) में काफी मदद मिल सकती थी। हालांकि यह कल्पना की उड़ान ही लगेगी परंतु यदि कैबिनेट मिशन द्वारा लागू की गई योजना के ‘गुट संबंधी खंडों’ को उसी रूप में क्रियान्वित किया जाता जैसा कि कैबिनेट मिशन योजना का सिद्धांत था तो शायद भारत का विभाजन टल सकता था। 
इन खंडों में केंद्र को कम शक्तियां थी। वह व्यवस्था हमारी वर्तमान व्यवस्था से अधिक संघीय होती। परन्तु इन खंडों का निर्वचन लीग और कांग्रेस द्वारा अलग अलग तरह से किया गया। वास्तव में कांग्रेस नेतृत्व, लीग की ही तरह साझी संप्रभुता बांटने को तैयार नहीं था। ब्रिटिश साम्राज्यवादी इसी ताक में थे क्योंकि उन्हें विभाजन से एशिया में सोवियत रूस के प्रभाव को कम करने के लिए पाकिस्तान के रूप में अधिक विश्वस्त सहयोगी मिलने वाला था। नतीजा था विभाजन।
साम्राज्यवादी ताकतें अपनी संप्रभुता को छोड़ने की मुद्रा में दिखाई देने के बावजूद भी ऐसा जाल बिछाती हैं कि वे भविष्य के लिए अपने राष्ट्रीय हित(आंतरिक संप्रभु हित) सुरक्षित रख पाएं। पाकिस्तान की समस्या ही नहीं श्रीलंका की तमिल समस्या के मूल में कहीं ना कहीं उपनिवेशवादी ताकतों का गहरा हित रहा है। दूसरी धुरी की समाजवादी  विश्व  ताकतें जिन्होंने बिना शर्त उपनिवेशों को मुक्त किया था के बारे में ऐसा लगा था कि वे चूंकि सैद्धांतिक रूप से मार्क्सवादी हैं जिनका अंतिम लक्ष्य राज्यविहीन  समाज बनाना है। अतः वे संप्रभुता के विरूद्ध कुछ वैचारिक संघर्ष चलाएंगे। परंतु जब लेनिन ने यह कहा ‘हम आदर्शवादी नहीं हैं और राज्य की आवश्यकता बनी रहेगी’ तो एक तरह से कार्ल मार्क्स को उन्होंने स्वप्नदर्शी घोषित कर दिया। साथ ही साम्यवाद के रास्ते से अराजकता को प्राप्त करने की आशाऐं भी धूमिल हो गई। ‘अराजकता को प्राप्त करने की आशा’ से भ्रम में ना पड़ें। समानता स्वतंत्रता और नैसर्गिक भाईचारे से युक्त अराजक समाज ही मनुष्य की आंखों से देखा गया अब तक का सबसे खूबसूरत स्वप्न है। 
साम्यवाद के रास्ते से या ज्यादा स्पष्ट कहना चाहिए साम्यवादियों के रास्ते से आंतरिक संप्रभुता नष्ट नहीं होगी। यह यूएसएसआर और जनवादी चीन के कृत्यों ने दिखा ही दिया है। 1960 के बाद जब यूएसए और यूएसएसआर करीब आए तो कहा जाने लगा कि तकनीकी रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच विचारधाराओं के आधार पर संघर्ष के बिंदु उत्पन्न नहीं होते। तो संघर्ष किन बिंदुओं पर उभरते हैं? उनके-अपने राष्ट्रीयहितों(आंतरिक संप्रभुता) के कारण। पूरे शीतयुद्ध का इतिहास विचारधाराओं का कम और राष्ट्रीयताओं के संघर्ष का इतिहास अधिक है। तत्कालीन रूस और चीन के मतभेदों को भी इसी प्रकाश में देखना चाहिए। 
अब जबकि यूएसएसआर नहीं रहा और चीन भी मार्क्सवाद को त्याग ही चुका है तो यह पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है कि राष्ट्रराज्यों के लिए उनके अपने हित ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद की मौजूदगी और इसके विरुद्ध सैद्धांतिक रूप से वैध होने के बावजूद भी आंतरिक संप्रभुता ही विश्व की असुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि एक तरफ तो यह साम्राज्यवाद के विरूद्ध औचित्य ग्रहण करती हुई दिखती है तो दूसरी तरफ इसके स्वाभाविक परिणाम हथियारों की होड़ के माध्यम से साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने वाले होते हैं। दुनिया आज भी आतंक के संतुलन पर चल रही है।
लास्की कहते हैं कि समाज अनिवार्य रूप से बहुलात्मक है। तो राज्य को भी बहुलात्मक होना चाहिए क्योंकि प्रसव पीड़ा से गुजर रही विश्व अर्थव्यवस्था की राष्ट्रराज्यों से असंगति है। उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत् अधिकार और लोकतांत्रिक विचारों के बीच अनिवार्य विरोध है। कानून का स्वरूप औपचारिक है। सार्वजनिक मताधिकार के बावजूद शासन वर्चस्वशाली लोगों के हाथों में है।
तो इन दशाओं में यदि कहीं पृथक संप्रभुत्व की मांग उठती है तो इसे समाधान नहीं मान लेना चाहिए। पृथक संप्रभु समाधान नहीं एक नई समस्या होगा और इस समस्या की कोई सीमा नहीं होगी। कम से कम ‘इतिहास का विवेक’ तो यही बताता है। समाधान तो यही होगा कि संप्रभुता को जनता में बिखेर दिया जाय और यह उत्पादन के साधनों का सामाजीकरण किये बगैर संभव नहीं होगा। 
एक वर्ग विभाजित समाज में आर्थिक संप्रभु ही राजनीतिक संप्रभु भी होता है। परंतु उत्पादन के साधनों का सामुहिकीकरण और उससे आंतरिक संप्रभुत्व का विनाश ‘सर्वहारा की तानाशाही’ से होना मुश्किल है। क्योंकि पहले तो जिस पैमाने पर आज ‘बुर्जुआ’ स्वतंत्रता फैल चुकी है उसे लपेटा नहीं जा सकता, दूसरे सर्वहारा की तानाशाही व्यवहार में एक पार्टी की तानाशाही साबित हुई है। इस शासक वर्ग का भी अपनी जनता के साथ अंतर्विरोध हो सकता है। जिससे पुनः अलग संप्रभुत्व की मांग उठ सकती है। याद करें चीन में हान राष्ट्रवाद और उइगर समुदाय के बीच संघर्ष और उइगरों का दमन।
कुल मिला कर ऐसा लगता है कि उत्पीड़न, अलगाव, राष्ट्रीयता आत्मनिर्णय व संप्रभुता की समस्याएं ऊपर से देखने पर चाहे धार्मिक, प्रजातीय, क्षेत्रीय, भाषाई, सांस्कृतिक, जातीय अस्मिताओं के आधार पर खड़ी हुई प्रतीत हों वास्तव में ये संप्रभुता के केंद्रीयकरण की समस्याएं हैं। इनका समाधान एक विश्व संसद या विश्व समाज जिसमें आंतरिक संप्रभुताएं नष्ट हो चुकी होंगी, उत्पादन के साधनों का सामाजीकरण हो चुका होगा में ही है। पुनरावृत्ति के साथ कहुंगा कि नई संप्रभुताएं नई समस्याएं होंगी। संप्रभुता को जनता में बिखेर देना ही समाधान है। इसी दिशा में संघर्ष करना होगा।
‘मोहन’ स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
इनसे mohanmanuarya@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

(पत्रकार Praxis से साभार)

Saturday, 16 February 2013

सबसे बड़ा लोकतंत्र और कश्मीर में नज़रबंद चौथा स्तंभ


-अंकित फ्रांसिस
(ग्रेटर कश्मीर के प्रकाशक राशिद मख्दूमी
से बातचीत पर आधारित आलेख)
 






"..कोई एडवाइजरी नहीं जारी की गयी, कोई लिखित सूचना नहीं लेकिन देश की रक्षा और एकता का हवाला दे (दिल्ली में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रीझने वाले ध्यान से पढ़े) अखबारों और तमाम तरह के सूचना पहुंचाने वाले माध्यमों पर रोक लगा दी गयी. पूरे कश्मीर को किसी अन्धकार युग में चार दिनों तक इसलिए धकेल दिया गया चूंकि दिल्ली हुकूमत की नींद में कोई डरावना सपना शामिल न हो जाय..."








                अंकित फ्रांसिस
9 फरवरी की एक आम ठंडी सुबह एक सुनी हुई सी कहानी केवल मुख्य पात्र बदलकर टीवी चैनलों ने सुनानी शुरू की. इस बार भी फांसी हुई, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले को दी गई और एक बार फिर इतने खुफिया तरीके से अंजाम दी गई कि लुटियन टीले पर गिद्ध की तरह मंडराने वाले पत्रकारों को इसकी भनक तक नहीं लगी. इसके अलावा आप अगर और थोडा आगे जाकर खबर के गुण-धर्म मापें तो उनमें रत्ती भर फर्क निकाल पाना मुश्किल हो जाएगा. इसके बाद जंतर-मंतर पर उमड़ी उन्मादियों की एक भीड़ ने लड़कियों तक को नहीं बख्शा और देश की एकता बने रहने के लिए उन्हें बाल पड़कर जी भरकर घसीटने से भी गुरेज नहीं किया. इस घटना के दौरान ‘आपकी सेवा में तत्पर दिल्ली पुलिस’ देशप्रेमियों की बहादुरी को फुटपाथ पर खड़ी निहारती रही.

ये तो दिल्ली की सुबह की कहानी थी जो की दिन ढलते-ढलते राष्ट्रवादी उन्माद के सुख में तब्दील हो गया. दूसरी तरफ देश का वह हिस्सा जिस पर हमारे सालाना रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च होता है, के लिए इस सुबह की तैयारी देश की सरकार ने पहले ही कर ली थी. जैसे पिछले साठ सालों का अँधेरा कश्मीरियों के लिए काफी ही नहीं था, तिहाड़ में अफजल को फांसी देने के बाद बिना किसी पूर्व सूचना के कश्मीर में कर्फ्यू (हालांकि अलग संविधान और एएफएसपीए जैसे कानूनों के चलते अघोषित कर्फ्यू वहां की हवा में घुले किसी तत्व जैसा ही है) कायम कर दिया गया. इन्टरनेट, केबल टीवी तक को नहीं बख्शा गया. लेकिन जैसे इतना सरकारी अँधेरा जैसे काफी ही नहीं था...ग्रेटर कश्मीर अखबार (कश्मीर का सबसे ज्यादा सर्क्युलेशन वाला अखबार) के प्रकाशक राशिद मख्दूमी बताते हैं की नौ फरवरी को भी किसी आम दिन की ही तरह अखबार पूरी तरह तैयार हो गया था और छपने के लिए ही जाने वाला था. तभी कोठीबाग़ थाने से उन्हें फ़ोन आया की अखबार निकालने पर रोक लग चुकी है, आपने छाप भी लिया तो डिस्ट्रीब्यूट नहीं करने दिया जायेगा. कोई एडवाइजरी नहीं जारी की गयी, कोई लिखित सूचना नहीं लेकिन देश की रक्षा और एकता का हवाला दे (दिल्ली में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रीझने वाले ध्यान से पढ़े) अखबारों और तमाम तरह के सूचना पहुंचाने वाले माध्यमों पर रोक लगा दी गयी. पूरे कश्मीर को किसी अन्धकार युग में चार दिनों तक इसलिए धकेल दिया गया चूंकि दिल्ली हुकूमत की नींद में कोई डरावना सपना शामिल न हो जाय.

दिल्ली में बैठे ‘आज़ाद’ लोगों के लिए और खासकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों को ये जानकार ज़रूर आश्चर्य होगा की कश्मीर में बिना किसी पूर्व सूचना के और बिना किसी लिखित आदेश के अख़बारों के छपने और वितरण पर रोक लगा देना आम बात हैं. यह आदेश सिर्फ ऊपर कहीं से जारी होते है और नीचे वालों को उपर वालों की कभी कोई खबर नहीं होती. राशिद बताते हैं की इससे पहले २००९ में अमरनाथ-श्राइन बोर्ड विवाद के दौरान भी अखबारों पर रोक लगा दी गयी थी. इसके बाद २०१० में भी वामिक फारुख नाम के एक बच्चे की हत्या से उपजे विवाद के दौरान भी यही किया गया. राशिद थोडा रुआंसा हो जाते हैं जब बताते हैं की २०१० उनका देखा सबसे बुरा समय था. इस दौरान प्रशासन ने जानबूझकर लोकल मीडिया को निशाना बनाया. उनके अखबार के स्टाफ को ऑफिस पहुचने नहीं दिया जाता था. कोई आने की कोशिश करे और पकड़ा जाये (यह सुनकर आप इफ्तिखार गिलानी को याद कर सकते हैं) तो बेझिझक उस पर तमाम पुलिसिया तरीके की हिंसा की जाती थी. राशिद थोडा अधीर हो जाते हैं जब बताते हैं की कई बार तो कर्फ्यू पास होने के बावजूद प्रेस होने के नाते उन्हें रोक कर रखा जाता या जानबूझकर परेशान किया जाता. कई बार छाप जाने के बावजूद अखबार को बाँटने नहीं दिया जाता. पुलिस स्पष्ट कह दिया करती की रद्दी में बेच दो..और कई बार उनके अखबार को ये करना भी पड़ा. २०१० और २००९ में तो कश्मीर के सभी लोकल अख़बारों ने मिलकर संघर्ष समिति भी बनाई थी. २०१० में धरना भी दिया गया था. लेकिन इस बार की ख़ामोशी तो डरावनी है.

बातों-बातों में राशिद मुझसे भी पूछ बैठते हैं की आप ही बताईये की अगर आज यहाँ पत्रकारों और मीडिया में ही कोई इसके खिलाफ बोलने के लिए तैयार नहीं है तो किसी भी तरह की कोई उम्मीद आम आदमी कैसे और किससे कर सकता है? राशिद ये भी बताते हैं की कई खुफिया सूत्रों के कई बार समझाने पर भी न मानने के चलते उनके अखबार को डीएवीपी मिलना बंद हो गया. उन्हें इसकी वजह बताई गयी की उनका अखबार एंटीनेशनल ख़बरें छाप रहा था. विभाग से जब इस बाबत एंटीनेशनल का आधार पूछा गया तो जवाब में सरकारी अन्धकार ही इनके हिस्से भी आया. इन्हीं वजहों से कैसे उनके अखबार के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न करने की नाकामयाब कोशिश की गयी. यूँ तो कश्मीर में भी पत्रकार यूनियन है लेकिन वह अभी तक भी अखबारों के आपसी झगडे निपटाने के ही काम आती है. किसी भी चीज़ से उम्मीद करना राशिद को अब बेमानी लगता है. राशिद आगे कहते हैं कि पिछले ही साल प्रेस परिषद् के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू भी कश्मीर दौरे पर आये थे. उनके सामने ये समस्याएं सभी ने मिलकर रखी थी, उन्होंने भी इसे समझते हुये   केंद्र सरकार से इस बारे में बात करने के लिए कहा था. लेकिन दिल्ली जाकर क्या हुआ कुछ पता नहीं. 

हो सकता है की आपको राशिद के कुछ विवरण सुनकर किसी मध्यपूर्व (प्रचलित अर्थों में ही समझें) के देश की खुश्बू आने लगे या किसी क्रूर शासक के दौर की कहानियों में आपने ऐसा सुना हो. इससे स्पष्ट भी हो जाता है की ‘अहिंसावादी भारत’, प्रेस की आज़ादी (प्रेस फ्रीडम इंडेक्स २०१३) के मामले में 179 देशों की लिस्ट में 140वें नम्बर पर क्यूँ आता है. स्पष्ट हो जाता है की नेपाल,बांग्लादेश, भूटान और माली भी आप से ऊपर क्यूँ हैं.

बात करने के दौरान ही राशिद हमारे शक में भी साझा हो जाते हैं. वे शक जाहिर करते हैं की ऐसा क्यूँ है कि जैसे ही कश्मीर की स्थिति थोड़ी सुधरती है कुछ ऐसा किया जाता है की पूरी बात फिर से शून्य पर आकर टिक जाती है. राशिद बताते हैं की इस सीजन में सर्दियों में पिछले बीस सालों के मुकाबले सबसे ज्यादा सैलानी कश्मीर आये. लेकिन अब फिर इस घटना के बाद वही अन्धकार और सन्नाटा थाली में सजाकर कश्मीर के सामने परोस दिया गया है. इन्ही घटनाओं के चलते लोगों की आर्थिक स्थिति ख़राब होती जा रही है. युवाओं में इन घटनाओं से ख़ासा रोष उपजता है. राज्य की आर्थिक स्थिति को इससे कितना नुक्सान हो रहा है इसका अंदाजा लगन भी मुश्किल है. खासकर मीडिया को इस तरह बैन कर देने से किसी तक कोई खबर नहीं पहुँचती और एक अफरा-तफरी, केयोस का माहौल बन जात है. दो ही दिन पहले हम इसी से गुजरे हैं..जब तमाम तरह की अफवाहें इलाके में फ़ैल रही थीं. कितने मरे, किसने मारा कौन मारा या ऐसा कुछ हुआ भी या नहीं इसे वेरीफाई करने के लिए आपके पास कुछ नहीं है. जबकि साकार अगर इमानदार है तो ऐसे समय में मीडिया का अच्छा इस्तेमाल कर सकती है. लेकिन यहाँ नज़ारा दूसरा ही होता है और जानबूझकर पूरे माहौल को बदत्तर बना दिया जाता है.

यहीं से उन सवालों की शुरुआत होती है जिन्हें ज़बान पर लाना कश्मीर में एंटीनेशनल होने का तमगा आपको दिला देता है. क्यूँ एक राज्य के सवा करोड़ लोगों को सिर्फ सुरक्षा की दुहाई दे आप अन्धकार युग में धकेल दिया जाता है. देश की एकता की दुहाई देकर कैसे आप उसी देश के नक़्शे पर मौजूद एक राज्य को नजरबन्द कर देते हैं. क्यूँ कश्मीरी अगर देहरादून या अलीगढ़ में भी अपने हकों को लेकर प्रदर्शन करे तो उसे गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को किसी भी क़ानून के पालन की ज़रूरत नहीं पड़ती. और इन्हें गिरफ्तार होता देख किसी के मन में कोई सवाल नहीं पैदा होता..इसके इतर उसका कश्मीरी होना ही उसके गुनाह की तस्दीक के लिए काफी हो जाता है. सवाल तो यह भी है की बात-बात पर अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने वाली मेनस्ट्रीम मीडिया ने पांच दिन गुजरने पर भी इसके विरोध में कोई बात किसी भी मंच से क्यूँ नहीं उठाई? राशिद और मैं बातों के दौरान ऐसे सवालों के बादलों से घिरे नज़र आये. इनका जवाब न उनके पास था न मेरे पास. मेरे पास कोई तसल्ली भी नहीं थी क्यूंकि जब इतने हो हल्ले के बावजूद सुप्रीम कोर्ट अफजल को एक अदद वकील न दिला सका, जो उसका केस ईमानदारी से लड़ सकता..तो अब और क्या कहा जा सकता है. एक पूरी पीढ़ी जो इस अंधकार की गवाह बन रही है उसे आप कैसे देशप्रेम का अर्थ समझायेंगे... फिलहाल तो अख़बारों पर से लगी रोक हटा ली गयी है लेकिन विशेष रूप से कश्मीर में इस पेशे से जुडी तमाम तरह की परेशानियाँ अब भी ऐसे ही कायम है. 

राशिद की तरफ से फोन डिस्कनेक्ट हो जाने के बाद मैं काफी देर तक उस अन्धकार को अपने भी भीतर तहों में कहीं महसूस करता हूँ और तैयार हो जाता हूँ अपनी एक और स्टोरी के रिजेक्शन के लिए....

अंकित युवा पत्रकार हैं। थिएटर में भी दखल। 
अभी एक साप्ताहिक अखबार में काम कर रहे हैं।
 इनसे संपर्क का पता francisankit@gmail.com है। 
                                                           

(पत्रकार Praxis से साभार)

          

मेरे कौमार्य से कीमती मेरा जीवन है : सोहेला अब्दुलाली


-पुष्यमित्र

(इस आलेख के दो हिस्से हैं. लेखक ने पहले हिस्से में कन्फ्यूशियस के एक तीखे बयान के बहाने बलात्कार के प्रति समाज की पित्रसत्तात्मक मनःस्थिति को कठघरे में खड़ा किया है और दूसरे हिस्से में उन्होंने मुंबई में बलात्कृत हुई महिला सोहेला अबुदाली के आलेख का अनुवाद शामिल किया है जिनका सपष्ट मानना है कि "...हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है...." यह आलेख दिल्ली गैंग रेप केस के बाद बलात्कार और उसके इर्द-गिर्द उठ खड़ी हुई बहसों को एक सटीक दिशा देता है. पढ़ें... 
-मॉडरेटर)



पुष्यमित्र
प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस बलात्कार के बारे में कहा है कि अगर कोई स्त्री बलात्कारियों के चंगुल में फंस जाये तो पहले तो उसे उन बलात्कारियों का विरोध करना चाहिये. पर जब लगे कि विरोध करने से भी उनके इरादे बदले नहीं जा सकते, तो फिर स्त्री को बलात्कार का मजा लेना चाहिये. निश्चित तौर पर यह एक बहुत क्रूर सलाह है. क्योंकि मजा तो स्त्रियां अपने पति की जबरदस्ती का भी नहीं ले पातीं. हालांकि वे अनिच्छा से बरसों इसे झेलती रहती हैं. अधिकांश मामलों में मना भी नहीं करतीं और पति समझ भी नहीं पाता कि इतने सालों तक उसने अपनी पत्नी के साथ जो किया वह प्रेम नहीं बल्कि शारिरिक अत्याचार था. खैर, वह अलग संदर्भ है, यहां संदर्भ दूसरा है. अत्यधिक क्रूर होने के बावजूद मेरे मन में कंफ्यूशियस की यह उक्ति सालों से चक्कर खा रही है. हाल की घटनाओं के बाद छिड़ी बहस में कई दफा मैंने चाहा कि इन पंक्तियों को अपने मित्र समुदाय के बीच सोशल मीडिया में साझा करूं मगर हर बार कुछ सोच कर अपना इरादा बदल देता. पर दो दिन पहले एक बलात्कार पीड़ित युवती का आलेख पढ़ने को मिला. सोहेला अब्दुलाली, उनके साथ 1983 में गैंगरेप हुआ था. बाद में मानुषी नामक पत्रिका में उन्होंने एक आलेख लिखा जिसमें उन्होंने गैंगरेप के अपने अनुभव और रेप से संबंधित दूसरी बातों के बारे में लिखा है. कई मित्रों की तरह मैं भी मानता हूं कि यह मस्ट रीड टाइप आलेख है. इसलिए मूलतः अंग्रेजी में लिखे गये इस आलेख का मैंने हिंदी में अनुवाद किया है.

मगर इस आलेख से पहले कुछ अपनी बात भी कहना चाहूंगा. खास तौर पर कंफ्यूशियस की उस उक्ति के संदर्भ में. कंफ्यूशियस को चीन में कमोबेस वही स्थान हासिल है जो अपने देश में चाणक्य और पश्चिमी देशों में मैकियावेली को. वे सीधी सपाट और बेलाग शब्दों में समाधान पेश करते हैं. अगर मुझे उनकी उस उक्ति पर कुछ कहना हो तो सिर्फ इतना कहूंगा कि मजा लेने के बदले अगर उन्होंने झेल लेना लिखा होता यह और भी सटीक होता. क्योंकि मेरे हिसाब से बलात्कार कतई एक क्षुद्र किस्म की क्षति से अधिक नहीं है. इतनी भी नहीं कि इसे आपकी कानी उंगली के कटने के बराबर माना जाये. हालांकि मैं यहां स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं यह बात क्षति के संदर्भ में कह रहा हूं, न तो यंत्रणा के संबंध में और न ही अपराध के मसले पर नहीं.

किसी भी व्यक्ति की यौन स्वतंत्रता के अतिक्रमण को एक सर्वाधिक घृणित अपराध के रूप में देखा जाना चाहिये, और उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा होनी ही चाहिये. मगर साथ ही इस क्षति के आकलन पर पुनर्विचार भी करने की जरूरत है. क्योंकि यह पुनर्विचार उसके लिए अपराध का सामना करते वक्त और उसके बाद के जीवन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. अधिकांश पीड़ित महिलाएं विरोध करते वक्त बड़ा शारिरिक नुकसान झेलती हैं, जैसा कि इस केस में हमने देखा कि उस युवती को जान तक गंवानी पड़ी. कई पीड़ित बाद में जान दे देती हैं, क्योंकि उनकी और समाज की नजर में बलात्कार का अर्थ उनकी इज्जत का चला जाना है. और इसके बाद जीना निर्रथक होता है. मगर क्या सचमुच यह इतना निर्रथक है. इस दुनिया में स्टीफन हाकिंग्स जैसा शारिरिक तौर पर अक्षम व्यक्ति अपनी हर महत्वाकांक्षा की पूर्ति करते हुए जी सकता है, वहां एक दफा किसी यौन कुंठित अपराधी के हमले के बाद कोई भला ऐसा क्या हो जाता है कि कोई व्यक्ति जीने लायक नहीं बचता है.

इज्जत, यह जो शब्द है. बहुत पुराना और सर्वव्यापी शब्द है. हमारी दुनिया में बलात्कार ही एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें दोषी की इज्जत का तो पता नहीं, पीड़ित की इज्जत निश्चित तौर पर चली जाती है. देश में चल रहे महिला आंदोलनों ने कभी इस सवाल को बहुत गंभीरता से नहीं देखा, आज भी वे बलात्कार के बाद पीड़ित को हुई मानसिक क्षति को काफी बड़ा मानकर उसके लिए सजा की मात्रा बढ़ाने की मांग कर रही हैं. मगर वे कतई यह नहीं सोचतीं कि इस अपराध को सबसे पहले इज्जत के ठप्पे से मुक्त करने की जरूरत है. यह जो इज्जत इस अपराध के बाद जाती है, वह किसकी है? उस औरत की कतई नहीं जो शादी के बाद इस इज्जत को अपने पति को समर्पित कर देती है. यह इज्जत उस पुरुष की है, जिसे समाज पिता-भाई और पति के तौर पर स्त्री का स्वामी समझता है. इस समाज में औरतों का यौन संक्रमण उसकी इज्जत से जुड़ा है, जबकि पुरुषों का यौन संक्रमण हाल-हाल तक घर की औरतों द्वारा ही नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है.

सबसे पहले तो इज्जत के इस दोहरे मानदंड को खत्म करने की जरूरत है. रेप एक हादसा है इससे अगर किसी की इज्जत जाने की संभावना होनी चाहिये तो उस रेपिस्ट की जो किसी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करता है. ठीक उसी तरह जैसे एक चोर, एक पाकेटमार, एक घोटालेबाज की इज्जत चली जाती है. एक बार यह तथ्य स्थापित हो जाये तो फिर स्त्री जाति के लिए बलात्कार के हमले का सामना और उसके बाद का जीवन आसान हो जायेगा. फिर स्त्रियां यौन हमलों का सामना दृढ़ता से कर पायेंगी. 

अब आपके सामने पेश है सोहेला का यह आलेखः

“मैं अपनी जिंदगी के लिए लड़ी... और जीत हासिल की”-सोहेला अब्दुलाली


तीन साल पहले मेरा गैंगरेप हुआ था, उस वक्त मैं 17 साल की थी. मेरा नाम और मेरी तसवीर इस आलेख के साथ प्रकाशित हुए हैं. 1983 में मानुशी पत्रिका में. मैं बंबई में पैदा हुई और आजकल यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं. मैं बलात्कार पर शोधपत्र लिख रही हूं और दो हफ्ते पहले शोध करने घर आयी हूं. हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है.

मैंने महसूस किया है कि कई महिलाएं इस ग्रंथि के कारण चुप्पी साध लेती हैं, मगर अपने मौन के कारण उन्हें अपार वेदना का सामना करना पड़ता है. पुरुष पीड़ितों को कई वजहों से दोषी ठोहराते हैं और हैरत की बात तो यह है कि कई दफा महिलाएं भी पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं, संभवतः आंतरिक पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण, संभवतः खुद को ऐसी भीषण संभावनाओं से बचाये रखने के लिए.

यह घटना जुलाई की एक गर्म शाम की घटी. उस साल महिलाओं का समूह रेप के खिलाफ कानून में संशोधन की मांग कर रहा था. मैं अपने दोस्त राशिद के साथ थी. हम लोग घूमने निकले थे और बंबई की उपनगरी चेंबूर स्थित अपने घर से करीब डेढ़ मील दूर एक पहाड़ी के पीछे पहुंच गये थे और वहां बैठे थे. हम पर चार लोगों ने हमला किया, वे लोग दरांती से लैस थे. उन्होंने हमारे साथ मारपीट की, पहाड़ी पर चढ़ने के लिए मजबूर किया और वहां हमें दो घंटे तक बिठाये रखा. हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, और जैसे ही अंधेरा गहराया, हमें अलग कर दिया गया और अठ्ठाहस करते हुए उन्होंने राशिद को बंधक बनाकर मेरे साथ रेप किया. हममें से कोई प्रतिरोध करता तो दूसरे को वे चोट पहुंचाते. यह एक प्रभावी तरीका था.

वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे हमारी हत्या करें या नहीं. हमें अपने दम भर वह सब कुछ किया जिससे हम जिंदा बच जायें. मेरा जिंदा बचना था और वह हर चीज से अधिक महत्वपूर्ण था. मैं पहले उन लोगों का शारीरिक रूप से प्रतिरोध किया और जब मुझे गिरा दिया गया तो मैं शब्दों से प्रतिरोध करने लगी. गुस्से और चीखने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, मैं उन्हें प्रेम, करुणा और मानवता के लिए प्रेरित करने लगी, क्योंकि जिस तरह मैं इंसान थी, वे भी तो इंसान ही थे. इसके बाद उनका रवैया नर्म पड़ने लगा, खास तौर पर उनका जो उस वक्त मेरे साथ बलात्कार नहीं कर रहे थे. मैंने उनमें से एक से कहा कि अगर मुझे और राशिद को जिंदा छोड़ दिया गया तो मैं अगले दिन उनसे मिलने आउंगी. हालांकि इन शब्दों के बदले मुझे कहीं अधिक भुगतना पड़ा, मगर दो जिंदगियां दांव पर थीं. यही एकमात्र तरीका था कि मैं वहां से लौट पाती और अगली दफा खुद को रेप से बचा पाती.

जिसे बरसों की पीड़ा कहा जा सकता है उसे झेलने के बाद(मुझे लगता है मेरा 10 बार बलात्कार किया गया और कुछ देर बाद मैं यह समझना भूल गयी कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया. जाते वक्त उन लोगों ने हमें एक नैतिक उपदेश के साथ विदा किया कि मेरा एक लड़के के साथ इस तरह घूमना अनैतिक था. इस बात ने उन्हें सबसे अधिक नाराज किया था. उन्होंने ऐसा मेरे हित में ही किया था, वे मुझे एक पाठ पढ़ाना चाहते थे. यह बड़ी कट्टर किस्म की नैतिकता थी. उन्होंने हमें पहाड़ के नीचे छोड़ दिया और हम लड़खड़ाते हुए अंधेरी सड़क पर चलते रहते, एक-दूसरे पर टगते हुए और धीरे-धीरे चलते हुए. वे कुछ देर तक हमारा पीछा करते रहे, दरांती हिलाते हुए, और वह संभवतः सबसे बुरा पहलू था कि भागना इतना आसान था मगर मौत हमारे उपर ठहल रही थी. अंततः हम घर पहुंचे, टूटे हुए, क्षत-विक्षत, चूर-चूर. यह बच कर आने का एक अतुलनीय अनुभव था, अपने जीवन के लिए मोलभाव करना, हर शब्द तोलकर बोलना क्योंकि हम उन्हें नाराज करने की कीमत जानते थे, दरांती का वार कभी भी हमारे जीवन को समाप्त कर सकती थी. हमारी हड्डियों और हमारी आंखों में राहत दौड़ रही थी और हम ऐतिहासिक विलाप के साथ ढेर हो गये.

मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं इस बात को किसी और से नहीं बताउंगी, मगर घर पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपने पिता से कहा कि वे पुलिस को बुलाएं. वे इस बात को सुनकर चिंतित हो गये. मैं परेशान थी कि किसी और को उस अनुभव से नहीं गुजरना पड़े जिससे मुझे गुजरना पड़ा था. पुलिस असंवेदनशील थी, घृणित भी और वह किसी तरह मुझे दोषी साबित करने पर तुली थी. जब मैंने कहा कि मेरे साथ क्या हुआ, तो मैंने सीधे-सीधे कह डाला और इस बात को उन्होंने मुद्दा बना लिया कि अपने साथ हुए इस हादसे को बताने में मैं शर्मा नहीं रही थी. जब उन्होंने कहा कि इस बात का प्रचार हो जायेगा तो मैंने कहा, कोई बात नहीं. मैं इमानदारी से कभी यह सोच नहीं सकी थी कि मुझे या राशिद को दोषी माना जायेगा. जब उन्होंने कहा कि मुझे मेरी सुरक्षा किशोर रिमांड होम भेजा जायेगा. मुझे बलात्कारियों और दलालों के बीच रहना होगा ताकि मुझ पर हमला करने वालों को न्याय के सामने लाया जा सके.

बहुत जल्द मैंने समझ लिया कि इस कानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए न्याय मुमकिन नहीं है. जब उन्होंने पूछा कि हम पहाड़ी के पीछे क्या कर रहे थे तो मैं क्रुद्ध हो गयी. जब उन्होंने राशिद से पूछा कि वह क्यों निष्क्रिय हो गया, तो मैं चीख पड़ी. क्या वे यह नहीं समझते थे कि राशिद का प्रतिरोध मेरे लिए और पीड़ा का कारण बन सकता था. वे ऐसे सवाल क्यों पूछते थे कि मैंने कैसे कपड़े पहने थे, राशिद के शरीर पर कोई चोट का निशान क्यों नहीं है (पेट पर लगातार हमले के कारण उसे इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी), मैं दुख और निराशा में डूबने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें घर से बाहर भगा दिया यह कहते हुए कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं. यह वह सहायता थी जो मुझे पुलिस से मिली. पुलिस ने बयान दर्ज किया कि हम टहलने गये थे और लौटते वक्त देर हो गयी.

उस बात के तीन साल हो गये हैं, मगर ऐसा एक दिन भी नहीं बीता जब मुझे इस बात ने परेशान नहीं किया कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ. असुरक्षा, भय, गुस्सा, निस्सहायपन- मैं उन सब से लड़ती रही. कई दफा, जब मैं सड़क पर चलती थी और अपने पीछे कोई पदचाप सुनायी पड़ती तो मैं पसीने-पसीने होकर पीछे देखती और एक चीख मेरे होठों पर आकर ठहर जाती. मैं दोस्ताना स्पर्श से परेशान हो जाया करती, मैं कस कर बंधे स्कार्फ को बर्दास्त नहीं कर पाती, ऐसा लगता कि मेरे गले को हाथों ने दबा रखा है. मैं पुरुषों की आंखों में एक खास भाव से परेशान हो जाती- और ऐसे भाव अक्सर नजर आ जाते.

इसके बावजूद कई दफा मैं सोचती कि मैं अब मजूबत इंसान हूं. मैं अपने जीवन की सराहना पहले से अधिक करती. हर दिन एक उपहार था. मैंने अपने जीवन के लिए संघर्ष किया था और मैं जीती थी. कोई भी नकारात्मक भाव मुझे यह सोचने से रोकती कि यह सकारात्मक है.

मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती. ऐसा करना सबसे आसान था, और कई पुरुष ऐसे विभिन्न किस्म के दबाव के शिकार थे. मैं जिससे नफरत करती वह पितृसत्ता थी और उस झूठ की विभिन्न परतों से जो कहती कि पुरुष महिलाओं से बेहतर होते हैं, पुरुषों के पास अधिकार हैं जो महिलाओं के पास नहीं, पुरुष हमारे अधिकार संपन्न विजेता हैं. मेरी नारीवादी मित्र सोचतीं कि मैं महिलाओं के मसले पर इसलिए चिंतित हूं क्योंकि मेरा रेप हुआ है. मगर ऐसा नहीं है. रेप उन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसकी वजह से मैं नारीवादी हूं. रेप को किसी खाने में क्यों डाला जाये? ऐसा क्यों सोचा जाये कि रेप ही अकेला अवांछित संभोग है? क्या हर रोज गलियों में गुजरते वक्त हमारा रेप नहीं होता? क्या हमारा रेप तब नहीं होता जब हमें यौन वस्तु के तौर पर देखा जाता है, हमारे अधिकारों से इनकार कर दिया जाता है, कई तरीकों से दबाया जाता है? महिलाओं के दमन को किसी एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए, वर्ग विश्लेषम आवश्यक है, मगर क्यों बहुत सारे बलात्कार अपने ही वर्ग में किये जाते हैं.

जब तक महिलाएं विभिन्न तरीकों से दमित की जाती हैं. सभी महिलाएं लगातार बलात्कार के खतरे में हैं. हमें रेप को पेचीदा बनाने से रोकना पड़ेगा. हमें समझना पड़ेगा कि यह हमारे चारो तरफ अस्तित्व में है, और इसके विभिन्न स्वरूप हैं. हमें इसे गुप्त तौर पर दफन करना बंद कर देना होगा और इसे अपराध के एक रूप के तौर पर देखना होगा- इसे हिंसात्मक अपराध मानना होगा और बलात्कारी को अपराधी के तौर पर देखना होगा. मैं उत्साहपूर्वक जीवन जी रही हूं. बलात्कार का शिकार होना बहुत खौफनाक है, मगर जिंदा रहना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. मगर जब एक औरत को इसे महसूस करने से रोका जाता है, इसे तो हमारे तंत्र की गड़बड़ी माना जाना चाहिये. जब कोई बेवकूफ बनकर जिंदगी के एवज में खुद पर हमले को झेल लेती है तो किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि वह स्वेच्छा से मार खाना चाहती थी. बलात्कार के मामले में एक औरत से पूछा जाता है कि उसने ऐसा क्यों होने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, कहीं उसने इसका मजा तो नहीं लिया.

रेप किसी खास समूह की औरतों के साथ नहीं होता और न ही रेपिस्ट एक खास तरह के पुरुष होते हैं. रेपिस्ट एक क्रूर पागल भी हो सकता है और पड़ोस में रहने वाला लड़का भी या एक दोस्ताना अंकल भी. हमें अब रेप को किसी अन्य महिला की समस्या के तौर पर देखना बंद करना होगा. इसे हमें सार्वभौमिक तरीके से देखना होगा और एक बेहतर समझ की तरफ बढ़ना होगा. जब तक रिश्तों का आधार शक्तियां होंगी, जब तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता रहेगा, हम लगातार अपनी इज्जत गंवाने के खतरे में रहेंगे. मैं बचकर निकली हूं. मैं रेप किये जाने के लिए नहीं कहती और न ही मैंने इसका मजा लिया. यह एक सबसे बुरा किस्म का टार्चर है. मगर यह महिलाओं की गलती नहीं है.
आज सोहेला लिखती हैं, पढ़ती हैं और घूमती हैं. उसके दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. द मैडवुमन ऑफ जोगर एंड इयर ऑफ टाइगर, बच्चों की तीन किताबें, और कई छोटी कहानियां, लेख, खबरें, ब्लाग, कॉलम, मैनुअल आदि वे लिख चुकी हैं. उनके लिखित सामग्रियों को उनकी साइट www.sohailaink.com पर देखा जा सकता है.

पुष्यमित्र वरिष्ठ पत्रकार हैं। 
अभी रांची से प्रकाशित "पंचायतनामा" में कार्यरत हैं।
इनसे संपर्क का पता pushymitr@gmail.com है

(एक स्पष्टीकरण- मूलतः कन्फ्यूशियस की महिलाओं के प्रति समझदारी बहुत ही सामंती और पुरुषसत्तात्मक रही है. मूलतः उनका दर्शन महिला विरोधी दर्शन रहा है जिसने चीन में महिलाओं के प्रति शोषण व्यवस्था को हजारों सालों तक लगातार मजबूती दी. उनके दर्शन से हम इत्तेफाक नहीं रखते हैं. संभवतः उनकी इस समझदारी की वजह उनके दौर के चिंतन की दरिद्रता ही रही हो. लेकिन उपरोक्त आलेख में कन्फ्यूशियस के 'जिस' कोट को 'जिस' तरह लिया गया है, यहाँ प्रगतिशीलता का पुट है और यह असल में महिला मुक्ति की ओर संकेत करता है.  -मॉडरेटर)

(पत्रकार Praxis से साभार)

शिवसेना द्वारा पिटे कश्मीरी युवकों का दर्द : एक मुलाक़ात



सुनीता भास्कर
-सुनीता भास्कर


"...लेकिन हमें बार-बार टेरिरिस्ट कहा जाता है। हमारे हिंदु क्लासमेट हमारी फेसबुक वाल पर कई बार  टेरिरिस्ट टेरिरिस्ट लिख देते हैं। अफजल को फांसी होने पर हमारी कुलिग के फोन पर मेसेज आए कि बधाई हो  अफजल को फांसी हो गई। जफर ने बताया कि कालेज में  टीचर उनके प्रोजेक्ट में साइन भी नहीं करते हैं और कोई न कोई एरर बताकर फाइल वापस लौटा देते हैं। ..."

http://4.bp.blogspot.com/-VyqfBPDKOkA/UR0otrd-TcI/AAAAAAAAAMQ/BhUHPN5QHaQ/s1600/DSC_0008.JPGकुछ कश्मीरी युवकों से बातचीत करना जिदंगी का एक नया अनुभव रहा। हम कितनी बेफ्रिकी में जीते हैं, कितने बिंदास रहते हैं एक औरत का भय होने के सिवा और कोई भय नहीं। आखिर सौ करोड़ हिंदू जाति का एक हिस्सा जो हूं इसीलिए कभी महसूस ही न पायी कि अल्पसंख्यक होना क्या होता है उस पर भी मुस्लिम अल्पसंख्यक। 

आज जब उन युवकों से बातचीत के लिए उनके कमरे का एड्रस पूछा तो वह सहम गए। हम बुरा न मान जाएं शायद इसीलिए कहने लगे कि नहीं हम ही आ जाएंगे  मिलने बताईये कहां आएं। हमने पूछा कोई दिक्कत है कमरे में तो कहने लगे गर्ल्स के लिए नॉट अलाउड है। मैंने कहा हम तो एक जर्नलिस्ट की हैसियत से आ रहे हैं तो फिर उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें धमकाया है कि  कमरों में बैठे रहो बाहर निकलोगे तो खैर नहीं। और फिर आप लोग आओगे तो मकान मालिक को उनके घर में आना नागवार गुजरेगा। 

अब स्तिथियां कुछ समझ में आने लगी थी सो उन्हें उनके घर के पास के किसी पार्क में बुला लिया।  मैं अपने साथ एक सीनियर जर्नलिस्ट को लाई थी जिसने प्रामिस की थी  कि वह कश्मीरी स्टूडेंस की कंडीशंस  पर स्टोरी करेगी और उसके लिए अपने संपादक को भी मनवा लेगी। अपने अखबार की कश्मीरी स्टूडेंट्स के खिलाफ  विशेष पैकेजिंग देखकर इतना तो भान हो गया था कि स्टोरी छपना तो दूर आईडिया देने में भी लाइन हाजिर होना पड़ेगा।

कुछ देर इंतजार के बाद दूर से तीन नवयुवकों को आता देख हम एकाएक चौंक गए। हमने सोचा था कि हमारे वहां की तरह साधारण से लडक़े होंगे कुछ देर यहीं पार्क में बात कर चल लेगें। पर यह क्या यह तो विशुद्ध कश्मीरीयत भरे नौजवान, चेहरों पर डल झील सी निश्छलता, दूधिया  गुलाबी चेहरे,कुछ की हल्की तो कुछ की बड़ी दाड़ी और एक के सिर पर गोल सफेद (मुल्ला वाली) टोपी। हम एकाएक निर्णय तो नहीं ले पाए कि इन्हें यहां कालोनी के बीचों बीच के पार्क में बैठाना कितना मुनासिब होगा। लेकिन झट से उठकर खड़े हो गए। 

कालोनी वाले कोई झमेला करें इससे पहले हम उन्हें लौटा ले गए और आगे कोने में अपनी गाड़ी के पास खड़े खड़े लगभग चालीस मिनट  अनौपचारिक बातें की। इस बीच मध्यवर्गीय उस कालोनी के तथाकथित सभ्य व शिष्ट जन  हमें कश्मीरियों संग खड़े देख हार्न बजाते जरूर नजर आए। कुछ देर में दो स्कूटर सवार महिलाएं रोड़ी में स्लिप होकर नाली में गिर गई तो एकाएक वह कश्मीरी नौजवान दौड़ पड़े उन्हें उठाने.

बारामुल्ला डिस्ट्रिक के सोपेरा टाउन के इन नौजवानों में से एक मुह्म्मद जफर ने  बताया कि वह अभी अपने कालेज से लौटा है कल की घटना की अखबारी  प्रतिक्रिया के बाद वह क्लास पढऩे में सहज महसूस नहीं हो रहा था सभी लोग उन्हें रूड़ नजरों से देख रहे थे इसीलिए वह सिर्फ दो पीरियड पढक़र ही घर लौट आया। जफर का छोटा भाई मीर किसी कालेज में एडमिशन नहीं लिया है। जफर ने बताया कि  अब्बा व अम्मी ने कहा कि यहां से चला जा कहीं भी रह भाई के साथ पढ़ ले कुछ भी कर ले पर कश्मीर में मत रह। 

मीर ने कहा कि वह कुछ समय पहले ही यहां आया है सो वह अभी सोच समझ ही रहा है कि कहां व किस कोर्स में दाखिला ले। मीर ने कहा कि वह कल की घटना से काफी डरा हुआ है। उनके दो साथियों को शिव सेना के लोगों ने तिब्बती मार्केट के पास पकडक़र बहुत मारा है और जबरन घसीट कर पुलिस थाने ले गए। इसीलिए मीर को अब देहरादून में अच्छा नहीं लग रहा। तीसरे लडक़े आमिर नायक ने बताया कि देहरादून में लगभग दस हजार कश्मीरी हैं जिनमें स्टूडेंट और व्यापारी लोग हैं। 

उन्होंने बताया कि व्यापारी लोग ज्यादातर इललिटरेट हैं जो कि फेरी से साल बेचने का काम करते हैं। उसने बताया कि आज सुबह मेरठ का एक मुस्लिम दोस्त मिला उसने गले लगकर कहा कि कोई दिक्कत होगी तो बताना।  आमिर ने कहा कि काश यहां के सभी लोग हमारे साथ ऐसे ही पेश आते तो हम बहुत बेफ्रिकी से यहां रह सकते थे। लेकिन  हमें बार बार टेरिरिस्ट कहा जाता है। 

हमारे हिंदु क्लासमेट हमारी फेसबुक वाल पर कई बार  टेरिरिस्ट-टेरिरिस्ट लिख देते हैं। अफजल को फांसी होने पर हमारी कुलिग के फोन पर मेसेज आए कि बधाई हो  अफजल को फांसी हो गई। जफर ने बताया कि कालेज में  टीचर उनके प्रोजेक्ट में साइन भी नहीं करते हैं और कोई न कोई एरर बताकर फाइल वापस लौटा देते हैं। जफर ने बताया कि एक बार उसके सर पर पीछे चोट आ गई थी जहां पट्टी बांधी थी, लेकिन उस चोट के लिए उसे क्साल के कुलिगस ने बहुत टार्चर किया। क्साल की गर्ल्स कहती थी कि यह जफर के पीछे गोली लगी है इसीलिए घाव हुआ है। क्लास में कुलीग को देखकर लगता है कि हम चौतरफा टेरिस्ट होने की निगाहों से घिरे पड़े हैं। 

जफर ने बताया कि देहरादून में कमरा ढूंढने  के लिए अन्तत: उसे अपनी दाढ़ी काटनी पड़ी थी । वरना कोई भी कश्मीरियों को कमरा देने को तैयार ही नहीं होता। वह बताता है कि एक बार अनिल नाम के एक लडक़े से उसकी दोस्ती हो गई लेकिन दो तीन दिन  बाद जैसे ही उसे पता चला कि मैं कश्मीरी हूं तो उसने कहा कि उसे नहीं करनी किसी कश्मीरी से दोस्ती। कश्मीरी तो आंतकवादी होते हैं। और उसने मुझे अवाइड कर दिया। 

तीनों  लड़कों ने बताया कि वे कश्मीर में शांति बहाली के लिए मांग कर रहे थे। वहां पांच दिन से कफ्यू लगा है।  हमारे अब्बू लोग दूध लेने भी बाहर नहीं जा सकते। अगर यही स्थिति रही तो हमें  पैसों के भी लाले पड़ जाएंगे। हमारा खर्चा तो अब्बू ही कश्मीर से भेजते हैं। उन्होंने बताया कि उनके सोपेर टाउन की आबादी लगभग 48 हजार है। वहां की तीन पीढिय़ों ने किसी भी चुनाव में वोटिंग नहीं की है। वहां पर अभी लगभग तेरह लाख आर्मी लगी हुई है। जिन्होंने हमारी कितनी ही जमीन जब्त कर रखी है।  घर से निकलते हैं बाहर सीआरपीएफ व एसटीएफ का मन  होगा तो वह सीधे जाने देगा कोई सवाल नहीं करेगा और मूड बदल गया तो रोक लेगा फिर पूछताछ करेगा और अन्तत: छोडऩे के लिए 2 0 हजार की मांग करते हैं।  

अभी कश्मीर में इस कफ्यू के दौरान दस लोगों की मौत हो गई है जबकि मीडिया केवल एक की ही मौत दिखा रही है। उन्होंने बताया कि एक 11 साल के बच्चे को वहां की सीआरपीएफ ने अपनी बंदूक के बट से पीछे सर में मार दिया जिससे उसने दम तोड़ दिया और फिर उन्होंने उस बच्चे के शव को पानी में फेंक दिया। इसी तरह पुलिस  कभी हमारे घरों के सीसे तोड़ देती है तो कभी मस्जिद के सीसे तोड़ देती है । उसका सवाल है कि हमारी प्रार्थना की चीजें हमसे क्यों छीनी जा रही हैं। 

उन्होंने बताया कि वहां पर पुलिस दमन के लिए जिस टियर गैस का इस्तेमाल करती है वह हमारी आखों व शरीर के लिए भी हार्मफुल होता है।  अभी सोपोर में पांच लडक़े शहीद हो गए हैं। यहां पुलिस हमसे कहती है कि तुमने फेसबुक में आंतक फैला रखा है। उन्होंने बताया कि कश्मीर में लगभग दस फीसद सिक्ख व पांच से सात फीसद कश्मीरी पंडित हैं। वह उनके रक्षाबंधन होली समेत सभी त्यौहारों पर भागीदारी करते हैं। वहां पर स्पेशल आमर्ड फोर्सेस एक्ट का इतना खौफ है कि आठ साल के बच्चे का भी अपना आईडेंटीकार्ड होता है।  बिना पहचान पत्र के वह घर से बाहर  नहीं निकल सकता। रात के नौ बजे बाद बाहर नहीं निकलने दिया जाता।  

एक नौजवान व एक बुजुर्ग को पुलिस ने कश्ती में पत्थर भरकर डूबोकर मार दिया और कहते हैं कि कश्ती डूब गई थी। हम पाकिस्तान की मांग नहीं कर रहे। हम अपना स्वतंत्र कश्मीर चाहते हैं। अभी वहां पर पुलिस ना डाक्टरों को सख्त हिदायतें दी हैं कि अगर कोई भी अस्पताल में मरता है तो उसे मरा हुआ घोषित नहीं करेंगे और घर वालों से कहेंगे कि कौमा में है। उन्होंने यह भी बताया कि अब वहां पर सारे क्रिश्चयन मिशनरी स्कूल बारहवीं तक के खुलने लगे हैं। उन्होंने बताया कि वहां लोगों की आय का बड़ा साधन कृषि है इसीलिए पुलिस द्वारा भूमि कब्जाए जाने पर हजारों कश्मीरी बेरोजगार हो गए हैं। 

उन्होंने सीआरपीए व एसटीएफ के पुराने कारनामों के बारे में भी बताया कि एक व्यक्ति की पत्नी नीलोफर व उसकी बहन आसमा को  सेब के बगींचे  से लौटने के बाद  दोनों के साथ सामूहिक रेप कर उन्हें मार दिया गया। और एवज में उन पर कोई कार्रवाही भी नहीं की गई। अभी कफ्यू के दौरान एक गर्भवती महिला की एंबुलेंस को रोक दिया गया जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस वाले यह एक्ट गयारह साल के बच्चे पर भी लगा देते हैं उन्होंने जोर दे कर कहा कि वह पाकिस्तान की बात नहीं कर रहे हैं। वह अलग कश्मीर चाहते हैं।

सुनीता  पत्रकार हैं. 
अभी देहरादून में एक दैनिक अखबार में कार्यरत.
sunita.bhaskar.5@facebook.com पर इनसे संपर्क हो सकता है.

(पत्रकार Praxis से साभार)


गोरखालैंड की राजनीति और विमल गुरुंग के असमंजस


                                                                                                                                      -रमेश भगत

"...दरअसल विमल गुरूंग के इतना उत्तेजित होने का एक कारण यह भी है कि अलग गोरखालैंड राज्य के लिए लड़ने वाले अन्य संगठन विमल गुरूंग से नाराज हैं। उनकी नाराजगी का कारण जीटीए है। अन्य संगठनों का कहना है कि स्वायत्ता हमारा मकसद नहीं है, हमें अलग राज्य से कम कुछ नहीं चाहिए।..." 


 विमल गुरुंग
पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाकों में फिर से राजनीतिक हवाएं तेज होने लगी है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख और गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) के अध्यक्ष विमल गुरूंग ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग के लिए उग्र आंदोलन शुरू करने की धमकी दी है। विमल गुरूंग की धमकी के कई मायने हैं। दरअसल ममता बनर्जी चाहती है कि जिस तरह से गोरखाओं के लिए जीटीए बनाकर स्वायत्ता दी गई है उसी तरह बौद्धों और लेप्चाओं के लिए भी अलग से लेप्चा विकास परिषद् का गठन किया जाए। जीटीए के अध्यक्ष विमल गुरूंग, ममता बनर्जी की इस बात से नाराज है। विमल गुरूंग का कहना है कि "लेप्चा विकास परिषद् का गठन जीटीए के अधिन होना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी फूट डालो और राज करो की नीति के तहत गोरखाओं और लेप्चाओं को अलग करना चाहती है"। जीटीए का गठन त्रिस्तरीय समझौते के तहत हुआ है। इस समझौते में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार ने हस्ताक्षर किया है।

पिछले कुछ समय से विमल गुरूंग और ममता बनर्जी के रिश्ते सही चल रहे थे। लेकिन अब नहीं। दरअसल 29 जनवरी को दार्जिलिंग में हुए एक सरकारी कार्यक्रम में ममता बनर्जी और विमल गुरूंग साथ आए थे। उस कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने कहा कि दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का अभिन्न अंग है और इसे राज्य से अलग होने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को गोरखालैंड की मांग को छोड़कर विकास पर ध्यान देना चाहिए। ममता बनर्जी के इस भाषण के बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने ‘वी वांट गोरखालैंड’ के नारे लगाने लगे। जिससे आजिज़ आकर ममता बनर्जी ने कहा कि याद रखें मैं इस मामले को ‘रफ एंड टफ’ तरीके से भी निपटा सकती हूं। कुछ दिनों बाद विमल गुरूंग ने कहा कि ममता बनर्जी ने अपने नाम से उलट खुद को रफ एंड टफ बताकर अपने वास्तविक रूप का परिचय दिया है। ऐसी नीति चलती रही तो यह उनके राजनैतिक कैरियर का अंतिम चरण साबित होगा।

दरअसल विमल गुरूंग के इतना उत्तेजित होने का एक कारण यह भी है कि अलग गोरखालैंड राज्य के लिए लड़ने वाले अन्य संगठन विमल गुरूंग से नाराज हैं। उनकी नाराजगी का कारण जीटीए है। अन्य संगठनों का कहना है कि स्वायत्ता हमारा मकसद नहीं है, हमें अलग राज्य से कम कुछ नहीं चाहिए। साथ ही त्रिस्तरीय समझौते में सिर्फ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को बुलाने के लिए भी अन्य संगठनों ने राज्य व केंद्र सरकार की आलोचना की है। अन्य संगठनों के इस फैसले से गोरखाओं को लगने लगा है कि विमल गुरूंग अलग राज्य की मांग से हट रहा है। और सरकार के साथ नजदीकियां बढ़ाकर सिर्फ अपना फायदा देखने लगा है। इन बातों के दवाब में ही विमल गुरूंग ने अलग राज्य की मांग पर वापस लौटते हुए उग्र आंदोलन करने की धमकी दी है।

लेकिन विमल गुरूंग की इन धमकियों से ममता बनर्जी पर ज्यादा असर होने वाला नहीं है। क्योंकि ममता बनर्जी ने विमल गुरूंग को पहले ही कानूनी शिंकजे में कस रखा है। दरअसल मई 2010 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के तीन कार्यकर्ताओं ने अखिल भारतीय गोरखा लीग के नेता मदन तमांग की हत्या कर दी थी। अखिल भारतीय गोरखा लीग की अध्यक्षा भारती तमांग ने मदन तमांग की हत्या की सीबीआई जांच की मांग की है। सीबीआई जांच का डर ही विमल गूरूंग को कमजोर कर रहा है। जिसका राजनीतिक फायदा ममता बनर्जी उठा सकती है।

इस बात को ध्यान में रखकर विमल गुरूंग माकपा के करीब आने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन माकपा का संबंध विमल गुरूंग की अपेक्षा सुभाष घीषिंग से ज्यादा है। सुभाष घीषिंग गोरखालैंड नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नेता है लेकिन आम गोरखाओँ में उनका जनाधार काफी सिमट गया है। ऐसे में माकपा विमल गुरूंग के साथ क्या गुल खिलाती है यही पहाड़ में चल रही राजनीतिक हवाओँ का मिजाज बता सकता है।



रमेश पत्रकार हैं. अभी ईएमएमसी में कार्यरत. 
rameshbhagat11@gmail.com इनकी ई-मेल आईडी है.

(पत्रकार Praxis से साभार)