Saturday, 25 January 2014

दूर घने जंगल के बीच एकांत में बसे गांव के खड़कुआ की कहानी भाग-4

जब से कटरीना दुध दुहने लगी घास काटने लगी और राहुल खेती करने लगा खड़कुआ अपने खेती और घर के कामों को विस्तार देकर व्यवस्थित करने लगा राहुल ने अपना समूचा ज्ञान खड़कुआ को दिया जितना भी राहुल को ज्ञान था और कटरीना ने पर्सनैलिटी डवलैपमेंट सिखाया अधिक ज्ञान और पर्सनैलिटी डवलैप के बाद खड़कुआ और नम्र और सौम्य हो गया राहुल की दाढ़ी खूब बढ़ गयी अब वो सही मायनोँ में "राहुल बाबा" लगने लगा।

कटरीना सब्जियों का खेत सींचती तो सब्जियाँ भी सुंदर सुकुमार होने लगीं खड़कुआ अब अंग्रेजी और राजनीति का ज्ञानी हो गया था पर बाहर सभी उसे अनपढ़ सीधा गंवार समझते थे क्योंकि खड़कुआ कभी ज्ञान का प्रर्दशन नहीं करता था।कटरीना को मेहनती खड़कुआ बेहद पसंद आने लगा था पर अभी इस बात के किसी भी इजहार की जरुरत कटरीना को उचित न लगती थी।

उधर राहुल के अज्ञातवास पर मिडिया की मांग पर राहुल की माँ ने एक बाईट दी तो मीडिया ने उस बाईट पर कई बाइट मारी फिर विशलेषकों ने बाईट मारी कुल मिलाकर उस बाईट का विषलेषण कर मिडिया विद्वानों ने बाडी लेँगवेज आदि मिलाकर हजारों अर्थ निकाले समाचार पत्रों पर कव्वों ने चौंच मारी तो और अर्थ निकल आये। यूं भी नेताओं को पता नहीं होता कि उसकी बात के इतने अर्थ भी होते हैं।ठीक इसी तरह जैसे बाईट के अर्थ निकलते हैं वैसे ही हमारे गांव में मरे बैल की सियार भी आतें निकाल लेते हैं गिद्ध हड़ी तोड़कर मज्जा निकाल लेते हैं और बची खुची लोथें कव्वे निकाल लेते हैं बाकी जो बचा वो मक्खियां निकाल लेतीं हैं।

उधर चाय वाले के खिलाफ सब्जी वाले को खड़ा करने की दिशा में राहुल का रोड मैप बन रहा था कटरीना राहुल और खड़कुआ रोज दो टाईम नहाते पूजा पाठ करते और जमकर काम करते पढ़ते सीखते और गंभीरता से भावी कार्ययोजनाऐं बनाते थे।

उधर भचकती आँख वाला वो कपटी साधु गाँव गाँव घूमता-"काला सोना काला धन स्विटरजलेंड टनाटन" बम भोले तेरी माया !जब तक मिला हराम का खाया। अरख निरंजन! बोलता हुआ गांवों की जासूसी करता था ।अभी तक उसे फेरी वाले कबाड़ी वाले नेपाली शाल कंबल बेचने वाले जो भी पहाड़ के गाँवों में बाहरी आदमी दिखे उनकी अपनी चिलम में लगे कैमरे से फोटो लेता और फीडबैक जमाकर उस एल आई यू वाले को देता था पर अभी तक वो खड़कुआ के गाँव नहीं गया क्योंकि वहां जाने में पूरा दिन लग जाता था और वहां से लौटना एक दिन में संभव न था रास्ते में बाघ भालू का भी डर था।पर एक दिन कपटी साधु ने तय कर लिया कि वो खड़कुआ के गाँव जरुर जायेगा क्योंकि एल आई यू वाले ने उसे खुश होकर 5सौ रुपये दिये और फिर हजार का पत्ता देने का वादा किया मारे खुशी और लालच के कपटी साधु की आँख भचकने लगीं थी।

तो क्या भचकती आँख वाला ये कपटी साधु सदी की बड़ी खबर खोज पाऐगा?
क्या होगा राहुल के रोड मैप का?
कटरीना यहां कब तक यूं ही खेती करेगी ?
क्या कटरीना खड़कुआ से प्रेम करने लगेगी?
क्या होगा आगे? जानने के लिए अगले भाग का इंतजार करें।


(जारी.....)






deep-pathak
दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

दूर घने जंगल के बीच एकांत में बसे गांव के खड़कुआ की कहानी! -भाग 3

राहुल के घर में देश की सबसे उम्दा पालिहाउसों में उगी या एकदम प्राकृतिक परिस्तिथियों में उगी आर्गेनिक उत्तम कोटि की फल सब्जियां ही किचन तक आतीं थीं।और खड़कुआ की खेती पूर्णत:आर्गेनिक और विषैली खादों के बिना उगतीं थीं राहुल को पता था कि अगर वो सही माप के आलू टमाटर मटर शिमला गोभी उगाये तो ये देश की मंडियों से छंटकर तुरंत दस जनपथ पहुंच जायेगा नेता उद्योगपति अभिनेता सिने तारिकाऐं आदि देश का सबसे अच्छा खाना खाते थे।अब ये रेंडम ही था कि ये अच्छी सब्जियां हल्द्वानी मंडी से दिल्ली आजादपुर मंडी से होती हुईं राहुल की इच्छित जगह पर पहुंच जायें।

पर खड़कुआ की भक्ति में शक्ति थी और भगवान की उसपर विशेष कृपा थी सो भगवान ने राहुल की सुन ली खड़कुआ जिस लाला को सब्जी बेचता था उसकी जमीन पर एक छोटा आर्गेनिक फार्म बनाकर एक दिल्ली की कंपनी एक वातानूकूलित ट्रक में दिल्ली ले जाती थी एक दिन उस बंदे ने लाला की दुकान में उच्च कोटि के आलू देखे तो उसने कहा कि ये सारे आलू जब भी आयें सीधे मुझे दे दिया करो।इधर राहुल ने खेत से आलू खोदे साफ करे और बड़ी चालाकी से एक आलू के भीतर एक पत्र रख दिया कुछ कोड मैसेज में और यह पत्र वाला आलू तमाम बाधाओं को पार कर राहुल के किचन तक पहुंच गया।उधर राहुल की मां दुखी थी ये लड़का कब अकलदार होगा ना शादी करता है ना PM बनता है उपर से ठीक चुनाव के टैम पर जने कहां भाग गया ये सोचकर राहुल की मां ने राहुल के पसंद की सब्जी खुद बनाने की सोची और आलू काटने गयी तो इत्तफाक से वही आलू हाथ आया जिसमें राहुल का पत्र था राहुल की लिखावट उसकी मां ने पहचान ली और राहुल की कुशल जानकर वो बेहद खुश हुई कि राहुल अब मेहनत से देश संगठन के लिए एक कारगर रोड मैप तैयार कर रहा है।

इधर खड़कुआ जिस लाला को सब्जी बेचता था वहां एक एल आई यू वाला बैठता था उसे शक हुआ कि आजकल खड़कुआ कुछ ज्यादा ही सब्जियां बेचने ला रहा है आखिर बात क्या है उस एल आई यू वाले को खुद तो खड़कुआ के गाँव जाने की ताब न थी पर उसने एक आवारा कपटी भचकती आँख वाले साधु को इस काम के लिए पटाया कि कभी कभार वो गाँवों में घूमा करे कोई बाहरी आदमी दिखे तो सूचित करे हम तुझे गुप्त रुप से मुखबिर वाला ईनाम देंगे और उस कपटी साधु को अत्तर गांजे हेतु 2सौ रुपये दे दिये कपटी साधु तैयार हो गया।उसकी आँखे लालच में भचकने लगी

अब ये कपटी साधु क्या करेगा? क्या राहुल कटरीना का पता चल जायेगा? क्या खड़कुआ के बुरे दिन आयेंगे? राहुल के कारगर रोड मैप का क्या होगा? अगली किस्त का इंतजार करें!


(जारी.....)






deep-pathak
दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

दूर घने जंगल के बीच एकांत में बसे गांव के खड़कुआ की कहानी! भाग-2

अगले दिन सुबह खड़कुआ कटरीना और राहुल बहुत भोर में जाग गये नित्यकर्म से निवृत होकर तिमूर की दातुन की फिर सबने ठंडे पानी से बारी बारी झरने पर रीठे से स्नान किया फिर राख के ढौले से कपड़े धोकर सुखाने टांग दिये तब तक खड़कुआ ने आलू मटर टमाटर की तरकारी रोटी और दूध का नाशता तैयार किया सभी ने नाशता किया और खड़कुआ से कहा कि हमें भी साथ रख लो हम भी खेती बाड़ी करेंगे मिल बांट कर खायेंगे इस बात पर खड़कुआ खुश हो गया और राहुल गोबर साफ करने लगा कटरीना गाय दुहना सीखने लगी फिर वे खेतों की तरफ निकल गये और खेतों मेँ काम करने लगे राहुल जुताई करने लगा कटरीना घास काटने लगी उसने दुपट्टे से अच्छी तरह घूंघट काट रखा था और राहुल ने गमछे से सर बांध रखा था।कटरीना और राहुल मन लगाकर खेतों में काम करने लगे वे तेजी और कुशलता से काम सीखने लगे।

दोपहर डेढ़ बजे खड़कुआ ने दाल भात और तोरी की सब्जी और टमाटर की कढ़ी बनाई सबको भूख लग गयी थी हाथ पाँव धोकर सबने खूब खाना खाया थोड़ी देर आराम करने के बाद सब अपने अपने कामों में जुट गये।

इधर देश में राहुल की तलाश में कई सुरक्षा ऐजेंसियां शहरों में खोजबीन कर रही थी राहुल न मिला तो उनके बेरोजगार होने की आशंका थी और कटरीना की तलाश में सलमान और रणवीर समेत पूरी फिलम इंडस्ट्री जुटी थी।हांलाकि राहुल और कटरीना ने पत्र छोड़े थे कि उनकी चिंता न करें वे कहीँ अज्ञात जगह पर सकुशल हैं।पर कई फिल्में और विज्ञापन कटरीना के बिना अधूरे थे और मायानगरी में इस रुपसी के बगैर सब कुछ अधूरा था।उधर चुनाव सर पर थे और राहुल बाबा गायब थे।मीडिया में रोज नयी कहानियां थीं...

इधर राहुल कटरीना और खड़कुआ मेहनत में लगे थे और इस जिंदगी से बहुत खुश थे।खड़कुआ को अंग्रेजी और राजनीती का ज्ञान राहुल दे रहा था और पर्सनैलिटी डवलपमेंट कटरीना सिखा रही थी बदले में खड़कुआ उनको आम आदमी की जिंदगी की कठिन साधना में सधना सिखा रहा था।

खड़कुआ की खेती इस बार बढ़ने की संभावना थी कटरीना और राहुल खेतों में खूब काम करते और फसल फल सब्जी बेचने खड़कुआ खच्चर पे माल लाद के जाता था कटरीना और राहुल यहां छिपकर मेहनत करते हुए खुश थे और खड़कुआ इन नये मित्रों के आ जाने से खुश था।राहुल कटरीना यहाँ हैं ये खड़कुआ ने किसी को भी नहीं बताया था।खड़कुआ का गाँव सड़क से बहुत दूर था और वहां कोई आता जाता भी न था।लोग पहाड़ों के दूरस्त गाँवों को छोड़ शहर कस्बे सड़क के करीब आ गये थे।

राहुल को इस सादगी में जीते जीते देश में पालिटिकल बदलाव का एक कारगर रोड मैप की सफल योजना समझ में आने लगी जो भारी सफल होनी तय थी।और कटरीना रीठे से बाल धोते धोते सुनहरे बालों वाली पहले से ज्यादा फिट युवती लगने लगी उसकी फिटनेस सुधर गयी और रंग रुप बिना मेकअप और निखर आया।

एक दिन राहुल को अपनी कुशलता का समाचार पहुंचाने का एक नायाब विचार आया उसकी कुशलता की खबर भी पहुंच जाती पर राहुल तक कोई भी लाख कोशिशों से भी न पहुंच पाता।आखिर क्या थी ये योजना? आगे पढ़िए....



(जारी.......)




deep-pathak
दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

दूर घने जंगल के बीच एकांत में बसे गांव के खड़कुआ की कहानी! भाग-1

खड़कुआ ने बचपन से ही भगवान की भक्ति करनी आरंभ कर दी थी वो सबसे प्रणाम करता मीठा बोलता और खूब मन लगाकर मजदूरी का जो भी काम मिले करता था पैसा बचाता दो टैम भोजन करता कोई व्यसन न करता सुबह शाम रीठे से नहाता व उबली राख के गरम ढ़ौले से कपड़े धोता तिमूर की दातुन करता था।

दूर एक गाँव में जहां से लोग अपने घर छोड़ चुके थे वहीं एक पुराने छोटे से पुशतैनी मकान में रहता छोटा साफ सुथरा पुराना मकान था लिपाई पुताई करता सरकारी गल्ले की दुकान से राशन मिटितेल लाकर रखता था सब्जियां खुद उगाता था।बाकी बाजार में बेच आता जो पैसा मिले उससे जरुरत का सामान ले आता था।

अपनी जरुरतें कम से कम रखता खूब मेहनत करता था पढ़ाई लिखाई उसने की नहीं सो भगवान का भजन करता था मां बाप बचपन में ही गुजर गये थे किसी ने अपने होटल में काम पर लगा लिया पर जब हाथ पैर मजबूत हो आये तो वो अपने गाँव लौट आया और कठिन साधना जैसे दिन गुजारने लगा।

खड़कुआ ने अपने खेत खोदे बीज बोये धीरे धीरे अपने खाने भर को अनाज दालें फल सब्जियां उगाने लगा मूली ककड़ी लौकी कद्दू गहत भट्ट राजमा मटर गेहूं धान प्याज आलू धनियां हल्दी अदरक टमाटर शिमला मिर्च गोभी पालक... उसकी मेहनत का सिला मिलने लगा।

जानवरों के नुकसान से फसल बचाने के अनेक तरीके वो खुद सीख गया।धीरे धीरे अपनी मेहनत से खड़कुआ ने एक खच्चर खरीद लिया अपनी फसल बाजार में बेचने लगा तो उसका अच्छा दाम मिलने लगा घर में दो वफादार कुत्ते थे एक जोड़ी बैल और एक दुधारु गाय ।जिंदगी सुबह से शाम तक सातों दिन बारहों महीने लगातार काम मांगती थी और खड़कुआ काम में लगा रहता और भगवान पर गहरी श्रद्धा रखता था।

एक दिन की बात है दिल्ली का एक नौजवान नेता राहुल और मुंबई की एक सिने तारिका कटरीना रात को अपनी जिंदगी के बारे में सोचकर परेशान हो गये भगवान की कृपा से इनके मन में एक ही समय ये विचार आया कि ये अपनी वर्तमान जिंदगी छोड़कर कही दूर पहाड़ों की तरफ चले जायेंगे तो राहुल ने दाढ़ी बढ़ा ली दाढ़ी बढाने में वो माहिर था ही और कटरीना ने आम लड़कियों जैसे कपड़े धारण कर लिए और एक रात चुपचाप ये रेल में बैठकर दिल्ली और मुंबई से भाग गये रेल से उतरे बस में बैठे जहां तक बस जाती थी पहाड़ में वहां तक गये फिर पैदल चल दिये इत्तफाक की बात थी इन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया राहुल को कटरीना के बारे में पता न था ये दोनों चलते चलते जंगल में खड़कुआ के घर पहुंच गये कटरीना ने आम आदमी की तरह दुपट्टा मुंह पे लपेट रखा था और हिंदी टूटी फूटी गंवारों से बदतर उसे आती ही थी और राहुल को गरीबों के घर रात बिताने का अच्छा अभ्यास था।

खड़कुवा ने मेहमानों को भोजन कराया और भगवान को धन्यवाद दिया कि भगवान ने उसे मेहमानों की सेवा का अवसर तो दिया ।रात काफी हो गयी सब थके थे और सो गये कटरीना राहुल और खड़कुवा जमीन में नरम घास भरे सादे बिछौने में गहरी नींद में चैन से सो गये।

उधर देश में टीवी चैनलों में हाहाकार मचा था...सुरक्षा ऐजेंसियां हाई अलर्ट पर थीं यहां खड़कुआ के घर अखबार टीवी रेडियो मोबाइल कुछ न था राहुल और कटरीना यूं तो एक पत्र छोड़कर गये थे पर देश को चिंता थी और कोई भी आला दिमाग उनके यहां होने की बात नहीं सोच सकता था..


(जारी....)




deep-pathak
दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Monday, 13 January 2014

टिहरी रियासत के खिलाफ संघर्ष के महानायक

Indresh Maikhuri
इन्द्रेश मैखुरी
-इन्द्रेश मैखुरी

"...किसानों पर होने वाले जुल्म के विरुद्ध दादा दौलतराम और नागेन्द्र सकलानी के नेतृत्व में किसानों के संघर्षों को संगठित किया गया.नागेन्द्र सकलानी युवा थे.देहरादून में हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आये थे.टिहरी लौटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से वे राजशाही के विरुद्ध चलने वाले आन्दोलनों में ना केवल शरीक हुए बल्कि उन्हें संगठित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.डांगचौरा के किसान आन्दोलन में काफी समय तक पुलिस को छकाते रहने के बाद उनकी गिरफ्तारी हो सकी थी.उसके बाद लम्बे अरसे तक राजा की आतातायी कैद में उन्हें रहना पडा..."

नागेन्द्र सकलानी
देश की आजादी के पांच महीने बाद,जनता के शासन की मांग करना और इस मांग के लिए शहादत होना,सुनने में कुछ अजीब सा लगता है. लेकिन उत्तराखंड की तत्कालीन टिहरी रियासत में 11 जनवरी 1948 को दो नौजवानों-नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शाहदत,रियासत में राजशाही से मुक्ति और जनता का शासन स्थापित करने के लिए हुई.देश में आजादी की लड़ाई दो मोर्चों पर लड़ी जा रही थी. एक तरफ अंग्रेजी राज से मुक्ति पाने की लड़ाई थी और दूसरी तरफ राजे-रजवाड़ों की रियासतों में इनके जुल्मी राज से निजात पाने का संघर्ष था.अंग्रेजों से मुक्ति तो 15 अगस्त 1947 को मिल गयी पर टिहरी रियासत के भीतर अंग्रेजों के चले जाने के जश्न से ज्यादा राजा के दमन से मुक्ति पाने की तीव्र खदबदाहट थी.


30 मई1930 में वर्तमान उत्तरकाशी जिले के रंवायीं क्षेत्र में तिलाड़ी में अन्यायी वन कानूनों के खिलाफ सभा करता हुए लोगों का कत्लेआम हुआ. तिलाड़ी के मैदान को तीन तरफ से शाही फ़ौज ने घेरा,जो हिस्सा फ़ौज ने नहीं घेरा था,वहाँ यमुना नदी बह रही था.मैदान में इकठ्ठा हुए लोगों के पास दो ही विकल्प बचे या तो राजा की फ़ौज की गोलियों से मरें या फिर यमुना में कूद कर.इस तरह टिहरी रियासत ने तिलाड़ी में अपना लोकल जलियांवाला बाग़ कांड रच कर,जुल्म करने के मामले में अपने औपनिवेशिक प्रभुओं की बराबरी करने की कोशिश की.25 जुलाई 1944 को 84 दिन के अनशन के बाद श्रीदेव सुमन की शहादत हुई,जो कि राजा के अधीन उत्तरदायी शासन की ही मांग कर रहे थे.

इन बलिदानों के बीच टिहरी रियासत के अन्दर जनता पर राजशाही का दमन जारी रहा.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो दूर की कौड़ी थी.शांतिपूर्ण सभा,जुलुस प्रदर्शन आदि का अधिकार राजदरबार में बंधक था.नाममात्र की खेती पर भी राजा की तरफ से भारी कर थोप दिए गए थे.दलदली और ढलवां भूमि जिस पर बमुश्किल ही खेती हो पाती थी,उस पर भी 75 से 80 रुपया कर लिया जाता था.जिन क्षेत्रों में आलू उत्पादन अच्छा होता था,वहां इसे बेचने का अधिकार राजा ने आलू सिंडिकेट को दे दिया था.आलू सिंडिकेट वाले किसानों से बेहद मामूली दामों पर आलू खरीदते और उन्हें बाहरी प्रदेशों में ऊँचे दामों पर बेच कर भारी मुनाफा कमाते थे.

किसानों पर होने वाले जुल्म के विरुद्ध दादा दौलतराम और नागेन्द्र सकलानी के नेतृत्व में किसानों के संघर्षों को संगठित किया गया.नागेन्द्र सकलानी युवा थे.देहरादून में हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आये थे.टिहरी लौटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से वे राजशाही के विरुद्ध चलने वाले आन्दोलनों में ना केवल शरीक हुए बल्कि उन्हें संगठित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.डांगचौरा के किसान आन्दोलन में काफी समय तक पुलिस को छकाते रहने के बाद उनकी गिरफ्तारी हो सकी थी.उसके बाद लम्बे अरसे तक राजा की आतातायी कैद में उन्हें रहना पडा.

राजा के जेल में कैसी नारकीय स्थितयां थी इसका अंदाजा नागेन्द्र सकलानी के कर्मभूमि साप्ताहिक में छपे पत्रों,जिन्हें प्रसिद्द इतिहासकार डा.शिव प्रसाद डबराल “चारण” ने अपनी पुस्तक-उत्तराखंड का इतिहास-भाग 6*टिहरी-गढ़वाल राज्य का इतिहास (1815-1949) में उद्धृत किया है, से पता चलता है.उक्त पत्रों के अनुसार जेल में ऐसे फटे-पुराने कम्बल दिए जाते थे,जिन पर गंदगी के चलते मक्खियाँ भिनभिना रही होती थी.इसी तरह के कपडे पहनने को भी दिए जाते थे.भीषण ठण्ड में कपड़ों के अभाव में बंदी सो भी नहीं पाते थे.नागेन्द्र सकलानी अपने एक पत्र में लिखते हैं कि “ऐसा प्रयत्न किया जाता था कि राजनीतिक बंदी दरबार के सम्मुख घुटने टेक दे.” शाह वंशीय टिहरी के राजाओं की न्याय व्यवस्था कितनी अन्यायकारी थी,इसका अंदाजा जेल में रहते हुए नागेन्द्र सकलानी और दादा दौलत राम द्वारा 10 फरवरी 1947 को किये गए अनशन की मांगों से लगाया जा सकता है.

किसान आन्दोलन के दौरान छीनी गयी संपत्ति की वापसी और अन्य मांगों के साथ उनकी एक मांग यह भी थी कि या तो उनपर लगाए गए आरोप वापस हों या फिर उनपर लगे अभियोगों की सुनवाई ब्रिटिश अदालत में हो.जिन अंग्रेजों के न्याय के पाखण्ड को भगत सिंह और उनके साथी पहले ही बेपर्दा कर चुके थे,टिहरी रियासत के राजनीतिक बंदी यदि उन अंग्रेजों की अदालत में इन्साफ पाने की कुछ उम्मीद देख पा रहे थी तो इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि टिहरी रियासत की अदालतों में राजा की स्वेछाचारिता के अलावा न्याय की कोई अन्य कोटि रही ही नहीं होगी.

बहरहाल नागेन्द्र सकलानी और दादा दौलत राम के उक्त अनशन का समाचार फ़ैलने पर बड़ी राजनीतिक हलचल हुई.देशी राज्य लोकपरिषद,कांग्रेस,कम्युनिस्ट पार्टी,टिहरी राज्य प्रजामंडल और प्रवासी गढ़वालियों की संस्थाओं ने तत्काल राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग की.मजबूरन राजा को घोषणा करनी पड़ी कि 21 फरवरी 1947 को राजनीतिक बंदियों को मुक्त कर दिया जाएगा.

20 फरवरी 1947 को  ब्रिटेन की संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1948 से पहले भारत से अंग्रेजी राज के रुखसत होने का ऐलान कर दिया था.जिस समय जवाहरलाल नेहरू के आह्वान पर देसी राज्यों की कई रियासतों के प्रतिनिधि संविधान सभा में हिस्सा लेने आ रहे थे,लगभग उसी वक्त टिहरी के राजा ने “टिहरी गढ़वाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट” पर दस्तखत कर दिए.इसके तहत राजदरबार के किसी भी कर्मचारी को राज्य की व्यवस्था भंग करने वाले को गिरफ्तार करने का अधिकार दे दिया गया था.स्पष्ट तौर पर यह राजशाही के विरुद्ध उठने वाले प्रतिरोध को कुचलने के लिए किया गया था.जहां राजा देश में चल रही बदलाव की लहर को अनदेखा करते हुए अपना दमनकारी शासन कायम रखना चाहता था,वहीँ प्रजा हर हाल में राजशाही की गुलामी से मुक्ति पाना चाहती  थी.

जनता की इस मुक्ति की चाह और नागेन्द्र सकलानी जैसे नेत्रित्वकारियों के साहस का परिणाम था कि टिहरी रियासत के भीतर सकलाना से शुरू होकर जगह-जगह आजाद पंचायतें कायम होने लगी.इन आजाद पंचायतों ने राज कर्मचारियों को खदेड़ दिया,पटवारी चौकियों पर कब्जा कर लिया,शराब की भट्टियां तोड़ डाली और राजधानी टिहरी पर कब्जा करने के लिए सत्याग्रही भर्ती करने का ऐलान किया.कीर्तिनगर में ऐसी ही आजाद पंचायत के गठन के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से नागेन्द्र सकलानी और त्रेपनसिंह पहुंचे थे.

10 जनवरी 1948 को नागेन्द्र सकलानी की अगुवाई में कीर्तिनगर में सभा हुई और वहां राजा के न्यायालय पर कब्जा कर,उसपर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर आजाद पंचायत की स्थापना की घोषणा कर दी गयी.11 जनवरी को राजा के सब डिविजनल ऑफिसर(एस.डी.ओ.) और पुलिस सुपरिंटेंडेंट के नेतृत्व में पुलिस ने  न्यायालय पर कब्जा करना चाहा.लोगों ने उन्हें बंधक बनाने की कोशिश की.एस.डी.ओ. के आदेश पर आंसू गैस के गोले लोगों पर छोड़े गए.क्रुद्ध जनता ने राजा के न्यायालय भवन पर आग लगा दी.आग लगी देख एस.डी.ओ. और पुलिस सुपरिंटेंडेंट जंगल की तरफ भागने लगे.नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी उन्हें पकड़ने दौड़े तो एस.डी.ओ. ने उनपर गोली चला दी,जिससे दोनों शहीद हो गए.

पेशावर विद्रोह के नायक कामरेड चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में दोनों शहीदों का जनाजा टिहरी ले जाया गया और राजाओं के शमशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया.अपने पुत्र मानवेन्द्र शाह को गद्दी सौंप कर भी राज्य पर नियंत्रण रखने वाले राजा नरेन्द्र शाह को टिहरी के अन्दर नहीं घुसने दिया गया.टिहरी में प्रजामंडल के नेतृत्व में अंतरिम सरकार गठित हुई और 1949 में टिहरी का भारत में विलय हो गया. कामरेड नागेन्द्र सकलानी और कामरेड मोलू भरदारी(ये कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीद्वार सदस्य थे) की शहादत टिहरी राजशाही के ताबूत में अंतिम कील साबित हुई.

यह विडम्बना ही कही जायेगी कि जिस राजशाही से मुक्ति पाने के लिए इतनी शहादतें और कुर्बानियां हुई,पहले लोकसभा चुनाव में उसी राजपरिवार की राजमाता कमलेन्दुमती शाह टिहरी संसदीय सीट से लोकसभा में जनता की प्रतिनिधि हो गयी.फिर दूसरी लोकसभा से चौथी लोकसभा तक और दसवीं लोकसभा से चौदहवीं लोकसभा में अपने जीवन के अंतिम समय तक मानवेन्द्र शाह,जिनका राजपाट बचाने के लिए नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की ह्त्या हुई,वे “जनता का प्रतिनिधित्व” करते रहे. पंद्रहवीं लोकसभा में टिहरी सीट के लिए हुए उपचुनाव में उनकी बहु मालाराज्लाक्ष्मी शाह सांसद हो गयीं. 

मानवेन्द्र शाह की राजनीतिक यात्रा तो आजादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस और आज राष्ट्रभक्ति की सबसे बड़ी झंडाबरदार भाजपा के अवसरवाद को भी साफ़ करती है. दूसरी से चौथी लोकसभा यानि 1957 से 1970 तक मानवेन्द्र शाह कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे और दसवीं लोकसभा यानि 1991 से चौदहवीं लोकसभा में अपने जीवन के अंतिम दिनों तक भाजपा के टिकट पर लोकसभा पहुँचते रहे. एक तरफ देश के लिए कुर्बान होने वालों की हिमायत और दूसरी तरफ जलियांवाला बाग़ काण्ड की छोटी-बड़ी प्रतिकृति रचने वालों को जनता का प्रतिनिधि बनवा देने,दोनों विपरीत ध्रुवी कामों को इन्होने बखूबी साधा हुआ है. यह हमारे लोकतंत्र का विद्रूप ही कहा जाएगा कि रियासतों-रजवाड़ों के राजा-महाराजा, आजादी के बाद लोकतंत्र के राजा हो गए.

नागेन्द्र सकलानी ने राजा के मातहत उत्तरदायी शासन और सभा,जुलूस,प्रदर्शन आदि करने की मांगों तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा बल्कि उस समय राजशाही द्वारा लगाए तमाम तरह के कर और अकाल की मार से कराह रही आम जनता तथा किसानों के साथ ना केवल उन्होंने स्वयं को एकताबद्ध किया बल्कि आगे बढ़कर उनका नेतृत्व किया.राजशाही को उखाड़ फैंकने और आजाद पंचायतों की स्थापना के अगुवा नेता तो वे थे ही. कामरेड नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादात ना केवल टिहरी रियासत के विरुद्ध निर्णायक शहादत थी,बल्कि यह जनता की मुक्ति के संघर्ष और भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन की बलिदानी,क्रांतिकारी परम्परा का भी एक स्वर्णिम अध्याय है.
                                         इन्द्रेश 'आइसा' के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं 
और अब भाकपा-माले के नेता हैं. 
indresh.aisa@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.