Friday, 10 January 2014

उन आँखों का हंसना भी क्या, जिन आँखों में पानी न हो!

चित्र-हितेश पाठक
शांति का पिता दीवान समय से पहले गरीबी और खुराक की कमी से बूढ़ा हो गया खुशक दम भाबर में लंबी दूरी तक सवारी खींचता तब हल्द्वानी में आटो न थे दो चार सिटी बसें थी दो चार पुरानी माडल की स्टेंडर्ड-20 मैटाडोर चलतीं थीं तांगे थे और साईकल बाकी पैदल।

पहाड़ छूट गया पहाड़ में जीवन आसान होता कमाने का ठिकाना होता तो क्यूं छूटता? भाबर में झौंपड़ी बना ली अपनी उमर से आधी उमर की बीबी थी चार बच्चे थे घर चलाना था तो रिक्शे का चलना लाजिमी था पर बढ़ती जरुरतें और कमजोर शरीर कब तक झेलता दीवान? वो चिढ़चिढ़ा हो गया गालियां बकता था जिंदगी को कोसता पर जिंदगी कोसने से मेहरबान नहीं होती कमाने से चलती है कम खुराक और अधिक मेहनत शरीर को खा जाती है खांसी बलगम और अंत में बलगम में खून... टीबी हो गयी।

टीबी की दवा के साथ खुराक चाहिए अंडा, दूध, मांस और आराम का काम ,पर ये तो गरीब बीमार के साथ एक भद्दा मजाक है बीमारी का भी और हालात का भी।

दीवान अशक्त हो आया घर की बाखड़ी भैंस(वो भैंस जिसे ब्याये लंबा समय बीत गया हो पर गाभिन न हो पायी हो उसे बाखड़ी कहते हैं) पर परिवार की जिम्मेदारी आ गयी बाखड़ी भैंस का दूध गाढ़ा होता है पर दीवानराम के नसीब में ये दूध न था ये बाजार में न बिकता तो घर कैसे चलता?

इस गर्दिश के समय को पहले पहल करीबी पुरुष रिशतेदारों ने ताड़ा, किलो भर आटा, दाल, मसाले, तेल पांच दस नकद का अहसान चढ़ाते,उसी चूल्हे पर खाते और इस परिवार की बेबसी का फायदा उठाने के इरादों से आये थे सो दीवान के बिस्तर-गुदड़ी में भी जा घुसे।अशक्त बीमार दीवान ने देखते जानते आँखें फेर लीं और करता भी क्या? खांसी बलगम खून थूकता वो दुनिंया से विदा हो गया।

गरीब औरत का पति टूटे दरवाजे सा ही हो मगर जब तक हो तब तक एक आभासी सुरक्षा तो देता ही है, ये भी ना रहे तो फिर राहचलतों के भी मन बढ़ आते हैं। पहले रिशतेदार फिर गाँव के मौकाताड़ू लोग बैठने बतियाने लगे और सभ्य लोग हालातों पर, नैतिकता चरित्र आदि पर किस्से बनाने लगे बातें कानों से कानों तक पहुंची और बदनामी बदचलनी करार दी गयीं।बेबसी ने बेबस बनाया और समय ने बेशर्म।

बच्चे बड़े हुए तीनों लड़कियों ने पेट भर सकने वालों को पहचाना और उनके साथ हो लीं किसकी शादी किसकी बरात!
दो लड़कियां तो आज भी अपने घरों में हैँ पर शांति का पति ठीक न था वो फिर से अपने पेट में बच्चा लिये पति का घर छोड़ मां के पास आ गयी इधर बहुत कुछ बदल गया था जवान भाई की बहू आ गयी थी घर में मां ने थोड़ा जमीन दे दी थी उसपे शांति रहती थी।कमाने जाती थी नौकरी करती थी जवान शरीर था ही शकल सूरत भी ठीक थी।

जाने कितने काम किये एस टी डी बूथ पे काम होटल में रिशेप्सनिष्ट और अंत में चूड़ी पाउडर बिंदी लिपिस्टिक का खोखा खोल लिया जाने कब हालातों ने सैक्स रैकैट में पहुंचा दिया एक दिन पकड़ी गयी बरेली में अखबार में नाम छपा छूटकर आयी तो लोग हंसते थे चरित्रहीन ** कहने लगे वही मसल हुई "बेबसी ने चोर रास्ते खोले हालात ने बेशर्मी सिखायी" तो सफर यहां तक पहुंचना ही था....।

आज भी बेहया नजरें उसे लांछित करती हैं, तिरस्कृत फिकरे कसे जाते हैं ये आंखे जो उस पर हंसती हैं उसके हालातों को नहीं देखतीं, तो एक हिंदी फिलम का गाना याद आता है-
"उन आंखों का हंसना भी क्या जिन आंखों में पानी ना हो....।"

अब आप खुद सोचिए आखिर यहां किसका जमीर मर गया ?और किन आँखों का पानी मर गया?कामरेड लेनिन ने सेक्स पर 'थ्योरी आफ वाटर ग्लास' पर कहा था- "कोई भी व्यक्ति सामान्य हालात में नाली का पानी नही पीऐगा!" नालियां हों या नाबदान उनमें गंदगी इसी समाज की बहती हैं, वे तो केवल वाहक हैं।



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दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

भारतीय शाशकवर्गीय पाटियां और केजरीवाल का लोकरंजकवाद।

जो केजरीवाल की गर्वनेंस पर लोकरंजकवाद का इल्जाम लगाने में लगे हैं वो लोग जो अपने 40साल के राजनैतिक जीवन में सही तरीके से न ओछापन कर पाए ना गंभीरता रख पाए।भारतीय राजनीति में 75% नेता बेहद ओछे थे और अब भी हैं कैमरे के आगे संभल के बोलने के इस समय में भी लगातार इनके निकृष्ट बयान इस बात की बानगी हैं,आप रोज ही देखते सुनते हैँ।

कांग्रेस के भीतर चापलूसी पार्टी लाइन है और जनता के बीच में कांग्रेसी सांसद से लेकर वार्ड मेंबर तक की गुंडा संस्कृति ही एकमात्र सांगठनिक ढांचे का उसूल है।इसीलिए आपको यहां एन डी तिवारी और हरीश रावत जैसे चुपड़ी जुबान वाले नेता दिखेंगे या फिर जी न्यूज के स्टिंग मेँ बोलते कांग्रेसी विधायकों की भाषा आपने सुनी और देखी! संजय गांधी के समय से चली यह संस्कृति अब सांगठनिक सिद्वांत बन चुकी है।राहुल गांधी सोनिया अथवा प्रिंयंका चापलूस कांग्रेसी घेरे की न्यूक्लियस है और वे उन तक पहुंचायी गयी बातों से इतर फैसले नहीं ले सकते ना ही ये तीनों कोई राचनैतिक विजनरी हैं।शतायु के उपर की ये पार्टी अब अपनी जड़ों की सफाई नहीँ रख पायी नतीजे में कांग्रेस पार्टी उस कटहल के पुराने पेड़ सी हो गयी है जिसमेँ कटहल लगते तो हैं पर ढंग से फलित नहीं होते बीमार फलित होते हैं।

सुरक्षा एजेंसियों का एक बड़ा हिस्सा इनकी सुरक्षा में लगा हो और उपर से इंदिरा और राजीव गांधी के हादसे के डर से राहुल सोनिया प्रियंका अभी तक उबर न पाए तो ये क्या जनता तक जायेंगे?सच तो ये है कि ये जब कहीं पब्लिक के बीच बात करते हैं तो वहां सारे सुरक्षाकर्मी ही पब्लिक बन जाते हैं।इनको रैली में जनता बुलाने की जरुरत क्या है?एक रैली के बराबर तो सुरक्षा कर्मी होते ही हैं।

रही बात भाजपा की तो ये पार्टी नही ये तो दुनियां का सबसे छिछोरतम और निकृष्टतम जमावड़ा है इनकी गंभीरता फासिवादी घृणा और नस्ली घमंड है। दिखा दिखा के गंभीरता की ओछी नौटंकी करते रविशंकर प्रसाद, सुषमा, राजनाथ ,जेटली,जावड़ेकर की सयास गंभीरता से तो सिद्धू और मुख्तार अब्बास नकवी ही ठीक हैं वो जो हैं बोल बचन में सामने दिखते हैं।

मोदी एक चुनाव दंगों की तैयारी से जीता, एक दंगों के बाद जीता, एक चुनाव परवेज मुर्शरफ और पाकिस्तान को गालियां देकर जीता अचानक इनको विकास और गुड गर्वनेंस याद आ गया और ये विकास विकास गाने लगे हैं, इनकी यूपी में वापसी होगी देख लो अमित शाह आया दंगे हुए!प्रमाण सामने हैं।

लोहिया जेपी राजनारायण के चेले लालू मुलायम जैसों का हश्र आपके सामने है अधिक कहने की जरुरत नहीं हैं कि "हाथ कंगन को आरसी क्या?"

मायावती दलित उभार और राजनैतिक चेतना की गंभीरता को विस्तारित करने के बजाए हाथी की मूर्तियों पार्कों ब्लैक कैट कमांडो में ऐसी घिर गयी कि अब अपने दलित वोटरों को भी बमुशकिल दिखायी पड़ती है।

ठाकरे परिवार भाजपा से अधिक छिछोर और कांग्रेस की संजय गांधी कट गुंडई व अंधक्षेत्रवाद का काकटेल मात्र है।

दक्षिण के जयललिता और करुणानिधि को अधिक समझने की जरुरत नहीं यू पी के माया मुलायम का दक्षिण भारतीय डबिंग संस्करण मानिए।हां पूर्वोत्तर और बंग देश की सरकारें अपनी गंभीरता से प्रभावित करतीं हैं पर वहां से दिल्ली बहुत दूर पड़ता है।

हां तो बात केजरीवाल की हो रही थी हालांकि पूजींवाद में जब संकट और मंदी का दौर हो और इसे टालने के लिए लिमिटेड वार मार्केट( सीमित युद्ध बाजार) ना हो तो झोले से निकाल कर केजरीवाल अन्ना जैसे डायवर्जन टनल खोल दिये जाते हैं।जब मंदिर बनाने के नाम पर भाजपा सरकार बना ले गयी जबकि मंदिर से ना रोजगार मिलना था ना बिजली पानी पर सब्सिटी, तो केजरीवाल पर उम्मीदें तो कशमीर से कन्याकुमारी तक किंतु परंतु करते ही सही बन ही जायेंगी और संजीदगी तो दिख ही रही है ना वो मोदी जैसा बड़बोला है ना राहुल गांधी जैसा आर सी एम और एम वे जैसी कंपनी का मोटिवेटर टाईप है। कुल मिलाकर केजरीवाल फिलवक्त बड़ा खिलाड़ी तो लगता ही है।




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दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Saturday, 4 January 2014

हरिया हैरी जसुवा जैका, कैल नीँ जाणीं च्याल छन कैका!


हरिया हैरी बन जाता है और जसुवा जैक दीपुआ डैव बन जाता है रामुली रैमी बन जाती है और परुली पैरी,कुमाँउनी दलित से इसाई बने नाम गजब ट्विस्ट ले लेते हैं।कुमाँउनी में एक कहावत है-"हरिया हैरी जसुवा जैका,कैल नी जाणीं च्याल छन कैका ।" (हरिया जो हैरी है और जसुवा जैका कोई नहीं जान पाया ये किसके बेटे हैं)।

भारतीय वर्णव्यवस्था और जातिवाद समाज का कोढ़ है सभ्यता के इतने पड़ाव पार करने के बाद भी दलित और सवर्ण समाज में रोटी बेटी के रिशते नहीं भयंकर छुआछूत है ऐसे में दलित हिंदू धर्म में रहते हुए भी बांमन ठाकुर और बनिये की तिरस्कृत तुच्छता मेँ घुटते हैं।योरोपीय और पच्छिमी समाज में काले गोरे का भेद है पर मजबूत नागरिक कानूनों ने ये भेद मजबूती से मिटाया है,हाँलांकि कुछ समय पहले तक अमरीकी फिल्मों में सारे चोर और गुंडे काले लोग ही दिखाये जाते थे।

जब आप धरम बदल लेते हैँ तो कुछ हद तक मुक्ति का अनुभव करते हैं अब राम से इतर उनके पास गोरे यीशू होते हैं और उनकी किताबों में स्वर्ग के बड़े सुंदर फोटो के अलावा उनको कुछ नहीं मिलता क्योंकि धर्म बदलते ही आप गोरे और सुनहरे बालों वाले अंग्रेज तो नहीं बन जाते शकल रुप रंग तो वही रहता है।अगर रंग गोरा हो जाता तो पहले सारे सवर्ण धरम बदल लेते।

अब काला दलित हो या इसाई कथित सवर्णों को इससे क्या फरक पड़ता है?सवर्ण शब्द भी शायद अंग्रेजों का गोरा रंग और सुनहरे बालों को देखकर हीनताबोध में गढ़ा गया होगा।

हां तो कल में नये इसाइयोँ के बीच था जहां घरों में कलेंडर में यीशू क्रूस पर लटके बेबसी से इन नयी 'इब्ने मरियम' (खुदा की भेड़ें) को देख रहे थे और घरों में बाइबल के उपदेश जगह-जगह दिख रहे थे फिर प्रार्थना हाल में गया जहां नये युवक युवतियों ने "ओ यीशू फीशू" टाईप प्रार्थना गायी मुझे लगा कि खड़े होकर 'ओम जय जगदीश हरे' का इसाई अनुवाद गाया जा रहा है।

उसके बाद उधर के पंडीजी यानि फादर ने जो चोगे में घुसे टिपीकल पहाड़ी लगे उन्होँने हिंदू धरम की नये अधिकार से निंदा की और मूलत: जातिवाद को ही गरियाया,पर जब मैंने उनको बताया कि अब आपके ही दलित रिशतेदार जो राम की कैद में फंसे हैं वो आपको बिरादरी बाहर मानते हैं और नौकरी में आरक्षण अब भी चाहिए?या यीशू ने सारे धन धान्य के कोठार भर दिये?वे थोड़ा अकुलाए छटपटाऐ पर अंतिम अस्त्र छोड़ा "तुम तो नास्तिक हो!" मैंने कहा यीशू खुद नास्तिक था कामरेड था साधारण आदमी था,पर उसकी लड़ाई को आगे बढ़ाने के बाजाए इसाई पंडितों ने उसको भगवान बना डाला!

सरमन आफ द माउंट पर मेरे तर्कों से उधर के पंडिजी हैरत में थे बहस अच्छी हुई कुछ युवक युवतियों के काफिर होने का अंदेशा था सो उनको फादर ने कहा आप लोग जायें फिर बंद कमरे मेँ देशी शराब निकाली बोले "अपना बपतिस्मा करा लो इसाई बन जाओ।"मैंने कहा किसी अंग्रेज गोरी से शादी कराओ तय रहा।"

फिर हुआ यूं कि दीपुआ डैव तो न बना पर देशी दारु और कटोरे में मीट खाते हुए हैरी फिर से हरिया बन गया।कलेंडर में यीशू के होंठों पे मुस्कान थी।



deep-pathak
दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Tuesday, 26 November 2013

तहलका का साहस अब कहाँ है? : अरुंधती रॉय

Arundhati Roy...support for Maoist guerillas.
अरुंधती रॉय

-अरुंधती रॉय

तहलका के संस्थापक और प्रधान संपादक तरुण तेजपाल द्वारा गोवा में पत्रिका की एक युवा पत्रकार पर किए गए गंभीर यौन हमले के मामले पर  लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय की टिप्पणी 

हाशिया से साभार


तरुण तेजपाल उस इंडिया इंक प्रकाशन घराने के पार्टनरों में से एक थे, जिसने शुरू में मेरे उपन्यास गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स को छापा था. मुझसे पत्रकारों ने हालिया घटनाओं पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है. मैं मीडिया के शोरशराबे से भरे सर्कस के कारण कुछ कहने से हिचकती रही हूं. एक ऐसे इंसान पर हमला करना गैरमुनासिब लगा, जो ढलान पर है, खास कर जब यह साफ साफ लग रहा था कि वह आसानी से नहीं छूटेगा और उसने जो किया है उसकी सजा उसकी राह में खड़ी है. लेकिन अब मुझे इसका उतना भरोसा नहीं है. अब वकील मैदान में आ खड़े हुए हैं और बड़े राजनीतिक पहिए घूमने लगे हैं. अब मेरा चुप रहना बेकार ही होगा, और इसके बेतुके मतलब निकाले जाएंगे.

तरुण कई बरसों से मेरे एक दोस्त थे. मेरे साथ वे हमेशा उदार और मददगार रहे थे. मैं तहलका की भी प्रशंसक रही हूं, लेकिन मुद्दों के आधार पर. मेरे लिए तहलका के सुनहरे पल वे थे जब इसने आशीष खेतान द्वारा गुजरात 2002 जनसंहार के कुछ गुनहगारों पर किया गया स्टिंग ऑपरेशन और अजित साही की सिमी के ट्रायलों पर की गई रिपोर्टिंग को प्रकाशित किया. हालांकि तरुण और मैं अलग अलग दुनियाओं में रहते हैं और हमारे नजरिए (राजनीति भी और साहित्यिक भी) भी हमें एक साथ नहीं लाते और जिससे हम और दूर चले गए. अब जो हुआ है, उसने मुझे कोई झटका नहीं दिया, लेकिन इसने मेरा दिल तोड़ दिया है. तरुण के खिलाफ सबूत यह साफ करते हैं कि उन्होंने ‘थिंकफेस्ट’ के दौरान अपनी एक युवा सहकर्मी पर गंभीर यौन हमला किया. ‘थिंकफेस्ट’ उनके द्वारा गोवा में कराया जाने वाला ‘साहित्यिक’ उत्सव है. थिंकफेस्ट को खनन कॉरपोरेशनों की स्पॉन्सरशिप हासिल है, जिनमें से कइयों के खिलाफ भारी पैमाने पर बुरी कारगुजारियों के आरोप हैं. 
विडंबना यह है कि देश के दूसरे हिस्सों में ‘थिंकफेस्ट’ के प्रायोजक एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जिसमें अनगिनत आदिवासी औरतों का बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्याएं हो रही हैं और हजारों लोग जेलों में डाले जा रहे हैं या मार दिए जा रहे हैं. अनेक वकीलों का कहना है कि नए कानून के मुताबिक तरुण का यौन हमला बलात्कार के बराबर है. तरुण ने खुद अपने ईमेलों में और उस महिला को भेजे गए टेक्स्ट मैसेजों में, जिनके खिलाफ उन्होंने जुर्म किया है, अपने अपराध को कबूल किया है. फिर बॉस होने की अपनी अबाध ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने उससे पूरे गुरूर से माफी मांगी, और खुद अपने लिए सजा का एलान कर दिया-अपनी  ‘बखिया उधेड़ने’ के लिए छह महीने की छुट्टी की घोषणा-यह एक ऐसा काम है जिसे केवल धोखा देने वाला ही कहा जा सकता है. 
अब जब यह पुलिस का मामला बन गया है, तब अमीर वकीलों की सलाह पर, जिनकी सेवाएं सिर्फ अमीर ही उठा सकते हैं, तरुण वह करने लगे हैं जो बलात्कार के अधिकतर आरोपी मर्द करते हैं-उस औरत को बदनाम करना, जिसे उन्होंने शिकार बनाया है और उसे झूठा कहना. अपमानजनक तरीके से यह कहा जा रहा है कि तरुण को राजनीतिक वजहों से ‘फंसाया’ जा रहा है- शायद दक्षिणपंथी हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा. तो अब एक नौजवान महिला, जिसे उन्होंने हाल ही में काम देने लायक समझा था, अब सिर्फ एक बदचलन ही नहीं है बल्कि फासीवादियों की एजेंट हो गई? यह एक और बलात्कार है- उन मूल्यों और राजनीति का बलात्कार जिनके लिए खड़े होने का दावा तहलका करता है. यह उन लोगों की तौहीन भी है, जो वहां काम कर रहे हैं और जिन्होंने अतीत में इसको सहारा दिया था. यह राजनीतिक और निजी, ईमानदारियों की आखिरी निशानों को भी खत्म करना है. मुक्त, निष्पक्ष, निर्भीक. तहलका खुद को यह बताता है. तो साहस अब कहां है?
अनुवाद: रेयाज

Monday, 25 November 2013

एक मार्क्सवादी कथा वाचक का जीवन दर्शन !

जब मैं छोटा बच्चा था स्कूल जाने में कतराता था हमेशा सोचता था कि सब तो बड़े भाई लोग पढ़ चुके मेरे लिए अब क्या बचा है?पर स्कूल तो जाना ही पड़ता था। घाटी में पाला पड़ता था ना तन भर कपड़े थे ना पेट भर भात। घर में मैं सबसे छोटा था बुढ़ापे की औलाद "बूढ़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल" तब अधिकतर होता यूं था कि बड़े और छोटे में 22 साल का फरक होता बड़ा भाई या बहन छोटे की देखरेख कर लेता कभी कभी तो इधर नाती पहले पैदा हो जाता उधर चाचा बाद में पैदा होता ।

मेरे पिता शराबी नं० वन थे हमेशा चिढ़े रहते कमाई बेहद कम थी और पांच बच्चे थे हमेशा घर में कलह रहती उपर से झगड़ा होता और पूरे परिवार से होता हुआ मुझ तक पहुँचता मैं रोता रहता और चिढ़े भाई मुझे मारते मैं और जोर से रोता वे और चिढ़ जाते। बड़ा गजब पगलों का परिवार था हर घड़ी लोग भुनभुनाते बड़बड़ाते रहते। हाय पैसा ! हाय पैसा ! घर क्या था नरक जानो !

मेरे पिता बीमार पड़े शराब ने किडनी लीवर सब खतम कर दिया था चव्यनप्राश और बैद्य की गोलियां कब तक उनको बचातीँ ? सो टैम पर निकल लिए जब पिता मरे तो घर में मेहमानों का तांता लग गया मरनी भोज देना होता है जीते जी खुद के खाने के लाले थे मरने के बाद इतनों को खिलाना ठैरा ! मेरे लिए तो ये उत्सव सा माहौल था इन दिनों मुझे पेट भर खाना मिलता था । तब मैं सोचता कि घर के और भाई लोग भी मर जायें।

खैर ठंड पाले कुपोषण से बचपन निकला तो हल्द्वानी आ गये यहां मौसम गरम था टैम पर धूप आती स्कूल छूट गया भैंस थी दूध बेचते थे तब तक एक बड़ा भाई मर गया था एक लापता हो गया आज तक लापता है (एक जो है वो मनाता है मैं मर जाउं) बड़ी बहन तो पिता ही ब्याह कर गये थे ।

यहां लकड़ियां बिक जाती तब 10 रुपये गठ्ठा था आज 150 रुपये गठ्ठा है मेरी बचपन की दोस्त मेरी कुल्हाड़ी आज भी मेरे पास है जब भी पैसे की कमी पड़े मैं गौला नदी के जंगल निकल लेता हूं आज मुझे लगता है कि अब तक बच गया तो आगे भी कुछ साल बचूंगा ही तब तक फेसबुक पे लिखूंगा अपने गांव और गंवारपने से आप लोगों को जोड़े रखूंगा।

जिंदगी जब तक आपको मौका दे धूप हवा पानी खाना कपड़े मिलते रहें तब तक इस जिंदगी का शुक्रिया अदा करो! हम सब अभागे लोग हैं सो किसी अभागे अधूरे को कभी परेशान न करें ये अधूरी दुनियां कभी तो पूरी होगी इसके लिए जरुरी है मार्क्सवाद! जो उच्चतम अधिकतम गरिमामय जीवन का रास्ता है।
हमें कोई मोदी या राहुल आकर नहीं खिलायेगा कोई सांसद या विधायक नहीं जिलायेगा।हमारी दुनियां एक अंधेरी गुफा है जिसमें खुद को जला के रोशनी करनी है। अंधकार की इस सुरंग में फंसे लोग कभी तो इसके पार निकलेंगे ही सो चलते रहो।

मुझे नदी जंगल एकांत अच्छे लगते हैं जब तक ये हैं तब तक रोटी पानी चलती रहेगी आजकल मजदूरी250रुपये हो गयी चार दिन कमाओ 15 दिन की खिचड़ी रोटी चल जाती है।दुनियां में भले लोग बहुत हैं सब लोग कामकाजी स्वस्थ होते पर कमबख्त ये ढेर सारा पैसा लोगों को लालची बना देता है ये जरुरत भर मिले हरेक को रोटी रोजगार पढ़ाई इलाज मिले यही तो मार्क्सवाद है कितना आसान और सरल है।

कोई भी कम्युनिष्ट आज तक भ्रष्ट या बलात्कारी नहीं हुआ।मानिक सरकार त्रिपुरा का मुख्यमंत्री 5हजार में महीना काटता है बाकी तो आप रोज देखते हैं इन भाजपा कांग्रेस के नेताओं को चोर लंपट उचक्के बलात्कारी अपराधी फिर भी इनको ही जिताना ठैरा काहे को भला?ना इनको वोट दो ना इनकी सभाओं में जाओ ।


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दीप पाठक 
 दीप पाठक सामानांतर के साहित्यिक संपादक है. इनसे deeppathak421@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.